Tuesday, 4 August 2020

5 अगस्तः हिन्दुत्व फासीवाद के जश्न का दिन- सीमा आज़ाद

5 अगस्त को प्रधानमंत्री और उनका पूरा कुनबा ‘ऐतिहासिक दिन’ बता रहे हैं। यह सचमुच ‘ऐतिहासिक दिन’ होगा। हम इसे इस दिन के रूप में याद करेंगे कि जब देश को अधिक से अधिक अस्पतालों की जरूरत थी, सरकार मन्दिर का शिलान्यास कर रही थी। जब कोरोना महामारी से मरने वालों की संख्या 40 हजार तक पहुंच रही थी और उत्तर प्रदेश की एकमात्र महिला कैबिनेट मंत्री तक की कोरोना से मौत हो चुकी है, हम मन्दिर के शिलान्यास की खुशी में दीवाली मनाने जा रहे है। जब अस्पतालों में वेंटिलेटर की कमी पड़ी हुई है, कोरोना की दवा की कमी हो रही है, उत्तर प्रदेश भर में ही संक्रमितों की संख्या 1 लाख तक पहुंच चुकी है, उस समय अयोध्या में ड्रोन नहीं, कई ड्रोनों से निगरानी की जा रही है। मानो चीन सीधे अयोध्या पर चढ़ाई करने की तैयारी में है। यह हास्यास्पद है कि चीन भारतीय सीमा के अन्दर आराम से आकर वापस भी हो गया, लेकिन निगरानी ड्रोन अयोध्या में मन्दिर के शिलान्यास की तैयारी के काम आ रहे हैं। जब कोरोना महामारी से करोड़ो लोग रोजगार खो चुके थे, सरकार सपरिवार (महन्त, पूंजीपति, दलाल मंत्रिगण) अयोध्या में जश्न मना रहे थे। आगे की पीढ़ियां यह पढ़ कर आश्चर्य करेंगी, कि जिस समय कोरोना का हवाला देकर मरने में 20 और शादी-व्याह में 50 लोगों से ज्यादा के इकट्ठा होने पर प्रतिबन्ध था, उस समय अयोध्या के हॉटस्पॉट रामजन्मभूमि में 200 लोगों को औपचारिक रूप से और सैकड़ों लोगों को अनौपचारिक रूप में इकट्ठा कर राम को स्थापित किया जा रहा था। इस मंजर पर अंजनी कुमार की गुजरात दंगे के समय लिखी गयी यह कविता दिमाग में गूंज रही है-
 ‘‘यह कौन से राम हैं जो अभी तक विस्थापित हैं,
 मुझे शक है इसकी नागरिकता पर
 तलाशी लो इस राम की’’

 
यह सब आज के समय में जी रहे लोगों को शायद अजीब न लगे, लेकिन आगे की पीढ़ी, जिसके लिए हम कल्पना कर सकते हैं कि वो असली लोकतन्त्र में सांस लेगी, उसे यह अजीब और वाहियात लगेगी। ये कौन लोग हैं जो राम की स्थापना में लगे हुए हैं यह इससे समझा जा सकता है कि हिन्दूमय टीवी पर पत्रकार के एक सवाल का जवाब देते हुए राम जन्म भूमि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बेहद खुशी के साथ बताया कि उन्हें उतनी ही खुशी हो रही है जितनी भारत में परमाणु बम बनने पर हुई थी। यह मौजूदा उन्माद की सटीक अभिव्यक्ति है। परमाणु बम ने भारत में जिस ‘राष्ट्रवाद’ का संचार किया था, ठीक उसी ‘राष्ट्रवाद’ के साथ आज राम मन्दिर का शिलान्यास किया जा रहा है। वास्तव में 5 अगस्त को राममन्दिर का ही शिलान्यास नहीं, ‘हिन्दू राष्ट्र’ का शिलान्यास किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के धार्मिक मुख्यमंत्री अजय बिष्ट ने यह कहा भी कि ‘‘भारत में एक नये युग की शुरूआत होने जा रही है।’’ बेशक हमारे संविधान में भारत के लिए ‘धर्मनिरपेक्ष’ पंथ को मानने की बात लिखी हुई है लेकिन अयोध्या में आज भारत के ‘‘हिन्दू राष्ट्र’’ बनने की ही घोषणा की जा रही है। अयोध्या में आज भारत के संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और पूरा देश इसे टीवी पर खुश होकर देख रहा है, रात में इसी खुशी में दीवाली भी मनायी जायेगी, और जैसाकि राजेश जोशी की कविता कहती है-
 ‘‘जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे मारे जायेंगे।’’
लेकिन यह तो 5 अगस्त के ‘ऐतिहासिक दिन’ की अधूरी कहानी है। 5 अगस्त, 2020 से नहीं, 2019 से ही भारतीय फासीवाद के इतिहास में ‘ऐतिहासिक’ बना दिया गया है। पिछले साल इसी दिन जम्मू-कश्मीर को भारत से जोड़ने वाले धागे धारा 370 और 35ए को तोड़कर पूरे राज्य को तीन हिस्सों में बांटकर उसे जेल में तब्दील कर दिया गया था। कोरोना लॉकडाउन के समय कई जनपक्षधर लोगों का यह कहना था कि ‘कश्मीर में लोगों पर क्या बीत रही है, भारत के लोगों को इसका एहसास हुआ होगा।’ लेकिन हमारे यहां आया यह लॉकडाउन भी कश्मीर की अदृश्य जेल से बेहतर था, बल्कि उसके आगे यह लॉकडाउन कुछ भी नहीं था। कश्मीर में 5 अगस्त 2019 से कर्फ्यू लगाकर एक दूसरे को संदेश देने का जरिया फोन भी पूरी तरह बंद कर दिया गया, लैण्डलाइन, मोबाइल सभी। कोई अखबार नहीं, कोई फेसबुक ह्वाट्सएप, फेसबुक लाइव, जूम मीटिंग कुछ भी नहीं, इण्टरनेट पूरी तरह बंद। घर के अन्दर बंद पूरी दुनिया से कटे हर तरफ सिर्फ वर्दी बन्दूकें और बूटों की आवाजें-‘जबरा मारे रोवहू न दे’। पहले वहां की जनता से बिना उनकी परामर्श उनका बनाया कानूनी हक छीना गया, फिर वे इसके खिलाफ अपनी राय न व्यक्त कर सकें, प्रदर्शन न कर सकें, कहीं लिख न सकें, यहां तक कि एक दूसरे से यह भी न कह सकें कि ‘यह बुरा हुआ, यह नहीं होना चाहिए था।’ पूरे कश्मीर को जेल में तब्दील कर दिया गया। लोगों की धर-पकड़ कर जेलें भर दी गयीं, रातों-रात लोग उठा लिये गये। वास्तविक जेलें कम पड़ी, तो भारत के संवैधानिक कानूनों की भी धज्जियां उड़ाते हुए कश्मीरियों को कश्मीर से बाहर देश भर की विभिन्न जेलों में बिना किसी सूचना या लिखा-पढ़ी के डाल दिया गया।
 

कौन कहां है किसी को कुछ पता नहीं। पता भी चल जाय तो, कागजी कार्यवाहियों के दांव-पेंच में मुलाकात संभव नहीं, जमानत संभव नहीं। किसी तरह इन सब का जुगाड़ लग भी जाये, तो इसमें लगने वाले 20-25 हजार रूपये का जुगाड़ सबके लिए संभव नहीं। इसी तरह की परिस्थितियों में पिछले एक साल से कश्मीर की जनता रह रही है। 5 अगस्त को कश्मीर को जेल में तब्दील हुए एक साल पूरा होने जा रहा है। यह इस सरकार के लिए खुशी का विषय है, और वे इसकी तैयारी भी कर रहे हैं। वस्तुतः 5 अगस्त फासीवाद के जश्न का दिन है। इस दिन उन्होंने अपने देश की जनता को ‘वो’ दिया, जो किसी को नहीं मिला, फिर भी वो खुश और अच्छा महसूस कर रहे हैं, क्योंकि इस दिन ‘दूसरे का’ कुछ छिना। यह फासीवादी राजनीति की खास पहचान है। वह जनता को कुछ देती नहीं, लेकिन जनता के अल्पसंख्यक हिस्से को ‘बाहरी’ ‘दूसरे’ ‘गैर’ बताकर बहुत कुछ खुलेआम छीन लेती है। बाकी बहुसंख्यक जनता में इससे ही ‘गर्व की भावना’ का संचार हो जाता है। भले ही उनके हिस्से का इतना कुछ छीना जा रहा है कि रोजगार, बिजली, पानी, जंगल, खेत ख्लिहान कुछ भी हमारा नहीं बचा, सब कुछ सामंती-साम्राज्यवादी आकाओं के हाथ में पहुंचता जा रहा है। कोरोना की आपदा को अवसर में बदलते हुए प्रधानमंत्री जी ने हमसे छीनने की इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। सिर्फ इस दौरान ही जनता का कितना कुछ छीन कर अम्बानियों अडानियों गूगल और जुकरबर्गों को दे दिया गया कि इस पर अलग से लिखा जा सकता है। जनता से सबकुछ छिन जाने का असर है कि कश्मीर के अधिग्रहण और मन्दिर के गर्व के साथ ही हर घर में डिप्रेशन के मरीज बढ़ते जा रहे हैं, हर दिन हर शहर में कम से कम एक या दो आत्महत्या की खबर आ रही है। इन आत्महत्याओं का भी इस 5 अगस्त के ‘ऐतिहासिक दिन’ से गहरा सम्बन्ध है। इस दिन का ‘गर्व’ उनकी वंचना को देश की स्थिति से जोड़ने की बजाय व्यक्तिगत बना दे रहा है। उंगली जहां उठनी चाहिए उधर से उठने वाली ‘गर्व’ की लपटे इतनी तेज हैं कि आंखें चौंधिया जा रही हैं। उसमें फासीवाद अपने को छिपा ले रहा है।
 5 अगस्त 2019 से जो हमारे देश में ‘दूसरों’ से छीन कर खुशी मनाने का सिलसिला जो तेज हुआ वो इस 5 अगस्त तक जारी है, आगे भी जारी रह सकता है। इस सिलसिले को बीच में एक आन्दोलन ने बड़ी चुनौती दी थी थी और ‘धार्मिक गर्व’ की राजनीति को बड़ी टक्कर दी थी, वो था नागरिकता आन्दोलन। धारा 370 हटाने के असंवैधानिक काम को अंजाम देने के बाद सरकार ने जनता के एक बड़े हिस्से को नागरिक ही न मानने वाला असंवैधानिक कानून बनाया-‘नागरिकता कानून’। क्रोनोलॉजी के हिसाब के इसके दो हिस्से हैं ‘एनआरसी’ और ‘सीएए’। इसका क्या अंजाम होगा इसे लोगों ने आसाम के उदाहरण से देख लिया। महिलाओं के नेतृत्व में चला यह आन्दोलन भारतीय लोकतन्त्र के इतिहास में बेमिसाल बन गया। इसने फासीवादी सत्ता की नींव हिला ही दी थी, कि सरकार को कोरोना का बहाना मिल गया। इस आन्दोलन के नाम पर लोकतन्त्र समर्थक लोगों की धर-पकड़- प्रताड़ना का सिलसिला मन्दिर के शिलान्यास की तैयारियों के बीच तक जारी था। गांधीवादी विचारक प्रोफेसर अपूर्वानन्द इसके ताजे शिकार बने हैं।
इसके पहले इस फासीवादी निजाम को कड़ी टक्कर देने का काम भीमा कोरेगांव के इतिहास ने किया था। इस शानदार इतिहास के 200 साल बाद नवी पेशवाई यानि नये ब्राहमणवादी मनुवाद के खिलाफ होने वाले जमावड़े से सरकार इतना डर गयी कि उसके बाद से देश में सबसे प्रतिष्ठित बुद्विजीवियों, कवियों मानवाधिकार कर्मियों, को सरकार ने जेल में डालना शुरू कर दिया। यूं तो यह पूरा मुकदमा ही फर्जी है, लेकिन इस आयोजन के नाम पर गिरफ्तारियां करने का अर्थ है कि यह सरकार लोकतन्त्र में नहीं, ब्राह्मणवादी मनुवाद में यकीन करती है, जो बराबरी पर नहीं, बल्कि जातिगत और पितसत्तात्मक शोषण पर आधारित है। आज अयोध्या में एक ऐतिहासिक इमारत की लाश पर इसी ‘हिन्दू राष्ट्र’ का खुला शिलान्यास किया जा रहा है। गौरतलब है कि अगर बाबरी मस्जिद किसी पुराने ढांचे पर खड़ी भी थी, तो अभी भी यह विवादित ही है कि वह पुराना ढांचा क्या था? बौद्धों का मानना है कि वह ढांचा राम मन्दिर का नहीं बल्कि बौद्ध मन्दिर का था। इलाहाबाद में 4 अगस्त को बौद्ध संगठनों इस मांग के साथ कचहरी में प्रदर्शन भी किया कि वहां राम मन्दिर नहीं, बौद्ध मन्दिर बनना चाहिए।
हममें से बहुतों को यह दृश्य भारत के संविधान की हत्या लग रही है। 5 अगस्त के बेचारे दिन को बार-बार सरकार संविधान की हत्या के लिए ही इस्तेमाल कर रही है। बहुतों ने इसकी हत्या का पहले से अनुमान लगा लिया था और ‘संविधान बचाने’ की मुहिम भी शुरू कर दी थी। लेकिन अब संविधान बचाने की मुहिम चलाने वालों को यह भी सोचना ही होगा, कि हमारे संविधान में आखिर क्या कमी है कि खुद सरकारें ही इसे जब चाहें तब आसानी से खारिज कर देती हैं। आखिर क्यों इसके होते हुए भी सरकारें बार-बार लोकतऩ्त्र की धज्जियां उड़ाने में सफल हो जाती हैं। इसी संविधान के तहत देश में इमरजेंसी लगाकर जनता का हक समाप्त किया जा चुके हैं। इस संविधान के रहते देश में यूएपीए और मकोका जैसे ढेरों जनविरोधी कानून न सिर्फ लागू हैं, बल्कि उन्हें हर साल अधिक लोकतन्त्र विरोधी बनाया जा रहा है। संविधान के रहते कश्मीर में जनमत संग्रह के पुराने वादे को पूरा करने की बजाय जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे धारा 370 और 35ए को आराम से हटा दिया गया। संविधान की धर्मनिरपेक्ष होने की घोषणा के बावजूद देश में एक ऐतिहासिक मस्जिद गिरा दी जा जाती है, और इसे अपराध करार दिये जाने की बजाय उस पर मंदिर बनाने का फैसला सर्वोच्च न्यायालय से आ जाता है। आज के अखबारों में मस्जिद के गिराये जाने को कल्याण सिंह जैसे लोग जो खुद उस वक्त संवैधानिक पद पर विराजमान थे- सही बता रहे हैं, जबकि यह मुकदमा अभी भी न्यायालय में लम्बित है और उसमें मस्जिद गिराये जाने को अपराध माना गया है। धर्मनिरपेक्ष संविधान की शपथ खाकर प्रधानमंत्री और मंत्री बनने के बावजूद ये सभी एक धार्मिक आयोजन में ऐलानिया न सिर्फ जाते हैं, बल्कि खुद इस विवादित आयोजन के आयोजक बन जाते हैं, पूरा देश इसका मूक दर्शक है। विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस इसका विरोध करने की बजाय खुद ’हिन्दू राष्ट्रवाद’ की माला जप रही है। क्या ये सब संवैधानिक है? नहीं है तो संविधान कहां है? संविधान को लागू कराने वाले कहां हैं? लागू कराने वाले खुद संविधान की खुल्लमखुल्ला धज्जियां उड़ायें, तो संविधान में इसका क्या प्रावधान है? नहीं है तो संविधान क्या है और क्यों है ? जब टीवी पर मंदिर बनने का दृश्य देखें तो इन सवालों पर एक बार जरूर सोचें। समझ में आयेगा कि 5 अगस्त ‘ऐतिहासिक दिन’ नहीं, लोकतान्त्रिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाने वाला फासीवादी दिन है।

Friday, 24 July 2020

भंवरी देवी से खुशी तक, आसाम से कर्नाटक तकः न्यायव्यवस्था की पितृसत्तात्मक सोच- आकांक्षा आज़ाद


कोरोना लॉकडाउन में महिलाओं पर होने वाली घरेलू हिंसा में बढ़ोत्तरी हुई है और के समाचार पत्रों में फिर से यह खबर आयी है कि कोरोना प्रभावित ‘रेड जोन’ क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा में और भी अधिक बढ़ोत्तरी हुई है। ये आंकड़े भारतीय समाज के बारे में बहुत कुछ कहते है। ऐसा नहीं है कि यह भारत के अनपढ़ अशिक्षित घरों की कहानी है। बल्कि इन घरों में ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि हमारे देश में कथित लोकतन्त्र के सभी खम्भे अपनी सोच में सामंती और पितृसत्तात्मक हैं। कारोना के समय में ही कम से कम तीन ऐसे फैसले न्यायालयों से आ चुके हैं, जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय समाज मूलतः एक पितृसत्तात्मक समाज है जिसकी नींव में सामंतवाद है। पितृसत्ता अर्थात पिता की सत्ता वाला समाज, जहां पिता ही घर का मुखिया हो। हमारे परिवार से लेकर राज्य भी इसी नींव पर टिका है। कानून बनाने वाली विधायिका (संसद और विधानसभा) और कानून लागू करने वाली कार्यपालिका (सरकार) के पितृसत्तात्मक चरित्र से तो फिर भी लोग रूबरू है लेकिन विशेष बात तब आती है जब न्याय दिलाकर संविधान और नागरिकों (विशेष तौर पर महिलाओं) के अधिकारी की रक्षा की जिम्मेदारी वाली संस्था में भी पितृसत्ता की जड़ें गहरी दिखने लगे। सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों के बारे में सामान्यजन में यही धारणा है कि यह स्वतंत्र, निरपेक्ष, और कभी गलत गलत न होने वाली संस्था है। कुछ ही समय पहले कर्नाटक हाई कोर्ट और गुवाहाटी हाई कोर्ट ने जो फैसले सुनाए है उसने कोर्ट के प्रति इस धारणा एक धक्का जरूर दिया है। ताजा मामला बिहार के अररिया का है। जहाँ एक रेप पीड़िता और उसके साथियों को सरकारी काम में बाधा डालने का आरोप लगाकर जेल भेज दिया गया। रेप सर्वाइवर को आलोक धन्वा के शब्दों में कहे तो ‘भागी हुई लड़की’ होने के कारण 10 दिनों तक जेल में रहना पड़ा वह फिलहाल जमानत पर बाहर है। पूरा मामला सामुहिक बलात्कार का है जिसमें सर्वाइवर के एक दोस्त ने मोटरसाइकिल सिखाने के बहाने अपने जान-पहचान के लोगों से लड़की का बलात्कार करवाया। सर्वाइवर, कल्याणी और तन्मय नाम के लोगों के साथ काम करती थी और उनके कहने पर इस मामले की एफआईआर दर्ज करवाई। कल्याणी और तन्मय अब भी जेल में है। तीनों एक ही संगठन का हिस्सा भी है। सवाल यह है कि आखिर इन तीनों ने ऐसा क्या कर दिया कि गुनहगारों की जगह इन्हें ही जेल भेज दिया गया। हुआ ये था कि जब सर्वाइवर का बयान निचली अदालत के जज साहब के सामने दर्ज हुआ और हस्ताक्षर के लिए पढ़ा जाने लगा तब सर्वाइवर ने जज साहब से यह कहने की हिमाकत कर दी कि ‘सर हमको समझ नहीं आ रहा आप मुँह पर से रुमाल हटा कर बताइये’ और इसे ठीक से सुनने के बाद ही वह इसपर हस्ताक्षर करेगी। क्या सर्वाइवर की इतनी सी मांग गलत थी की उसका बयान साफ शब्दों में उसे पढ़कर सुनाया जाए? या फिर एक गरीब अनपढ़ लड़की का इतने पढ़े लिखे ‘पुरुष’ जज साहब को इस तरह से टोक देना ही काफी था जेल भेज देने को? इस ‘हिमाकत’ के बाद कल्याणी और सर्वाइवर दोनों के माफी मांग लेने के बाद भी जज ने लड़की को ‘बदतमीज’ बताते हुए सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में जेल भेज दिया, सिर्फ उसे ही नहीं इस मामले में पीड़ित लड़की का साथ देने वाले दो लोगों को भी उस जज ने जेल में भेज दिया। बाकि इसकी किसे चिंता थी कि सामूहिक बलात्कार के आरोपी को जेल भेजे जाने की जरूरत थी, जो अब भी खुले बाहर घूम रहे और लड़की पर ही दबाव बना रहे है। सर्वाइवर की इस तरह की मामूली मांग को सामूहिक बलात्कार से ज्यादा गम्भीर मानकर उसे जेल भिजवाकर जज साहब ने खुद के साथ ‘न्याय’ किया। बीबीसी से बातचीत के दौरान सर्वाइवर कहती हैं ‘सब परिवार, सारा समाज क्या कहेगा? क्या हमको ही दोष देगा? क्या मेरा साईकिल चलाना आजादी से घूमना-फिरना, संगठन के लोगों का साथ देना प्रदर्शन में आना जाना, क्या इस सब मेरे रेप की वजह ढूंढी जाएगी?’ पितृसत्ता ठहाका लगाकर कहेगा -‘बिल्कुल, लड़कियों के लिए ये सब वर्जित है कि वह यूं उन्मुक्त घूमे, साइकिल चलाये, मोटरसाइकिल तो मर्दों की ही सवारी है, उस पर भला लड़की सवार होगी, तो उसके साथ यही सब होगा।’

एक नजर अपने समाज पर डाले तो हम पाते हैं कि महिला और पुरुष दोनों को ही समाज अलग-अलग ढांचे में रखना चाहता है। समाज में ‘आदर्श भारतीय महिला’ के कई ‘गुण’ माने गए हैं जैसे एक ‘आदर्श भारतीय महिला’ को एक अच्छी गृहणी होना चाहिए, पति को स्वामी मानकर दिन रात उसकी सेवा करनी चाहिए, पति अगर मारपीट भी करे तो चुपचाप सहते रहना चाहिए आदि आदि। इन्ही ‘गुणों’ में कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक और ‘गुण’ जोड़ा है। चीफ जस्टिस कृष्णा एस. दीक्षित ने बताया है कि ‘बलात्कार के बाद आदर्श भारतीय महिला को कैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए।’
शादी का झांसा देकर बलात्कार के इस मामले में चीफ जस्टिस ने आरोपी को बेल देते हुए महिला पर टिप्पणी की कि- ‘महिला का कहना है कि वह अपराध के बाद थकी हुई थी और सो गई थी, एक भारतीय महिला के लिए अशोभनीय है, हमारी महिलाएं बलात्कार के बाद ऐसे व्यवहार नहीं करती हैं।’ पितृसत्ता यहां भी अट्टहास करती हुई कह रही है- ‘बिल्कुल ठीक।’
वास्तव में चीफ जस्टिस दीक्षित उसी बीमार मानसिकता के शिकार है जहां लड़कियों के देर रात तक बाहर आने-जाने और शराब पीने से ‘स्त्री धर्म’ भ्रष्ट हो जाता है। इसलिए शिकायतकर्ता महिला को ही उन्होंने भरोसे लायक नहीं माना। उनका कहना है कि ‘शिकायतकर्ता ने यह नहीं बताया कि वो रात 11 बजे उनके (आरोपी) के दफ्तर क्यों गई थीं। उन्होंने आरोपी के साथ अल्कोहल लेने से भी एतराज नहीं जताया और सुबह तक उन्हें अपने साथ रहने दिया। उन्होंने यह भी नहीं बताया की उन्होंने शुरुआत से ही अदालत से सम्पर्क क्यों नहीं किया जब आरोपी ने कथित तौर पर उनपर यौन संबंध के लिए दबाव बनाया था।’ भारत में छेड़खानी से लेकर सामूहिक बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों की संख्या लाखों में है। हर घण्टे न जाने कितनी महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे। इनमें से कुछ मामले दर्ज होते हैं और कोर्ट तक पहुँचते है। ज्यादातर दर्ज होकर भी पुलिस स्टेशन के फाइलों में धूल फांकते है। भारत में इन आरोपियों को सजा मिलने की दर सिर्फ 18 प्रतिशत है जिसका मतलब है कि 100 में से 72 आरोपियों को कभी उनके अपराध की सजा नहीं मिलती। जिस तरह के सवाल चीफ जस्टिस दीक्षित ने शिकायतकर्ता से की क्या बिल्कुल उसी तरह के सवाल एक बलात्कार की सर्वाइवर से उसका घर, परिवार, समाज नहीं पूछता?
‘इतनी देर रात अकेली क्यों बाहर गई थी?’, ‘ये कैसे कपड़े पहन रखें है तुमने? ऐसे कपड़ो के कारण ही बलात्कार होते हैं।’, ‘ताली एक हाथ से नहीं बजती जरूर तुमने ही शह दी होगी।’, ‘तुम्हे देखकर तो नहीं लगता कि तुम्हारे साथ रेप हुआ है। तुम खुश कैसे रह सकती हो?’ और अगर रेप हुआ तो भी तुम पहले क्यों नहीं बताया?...आदि आदि। और इन्ही सब सवालों के माध्यम से जिस तरह से सर्वाइर को ही दोषी ठहराया जाता है उसी का नतीजा है कि लड़कियां और महिलाएं इन सब गम्भीर मामलों पर चुप्पी साध लेती हैं।
तीसरा मामला गुवाहाटी हाई कोर्ट का है। जहाँ 21वीं में भी सदी में चीफ जस्टिस अजय लाम्बा और न्यायाधीश सौमित्रा सैकिया का कहना है कि ‘अगर एक महिला हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी करती है और सिंदूर और शाखा (शंख से बनी चूड़ियां) पहनने से मना करती है तो इसका मतलब है कि वह महिला इस शादी को अस्वीकार कर रही है।‘ इस तरह के महिला विरोधी बयान देकर कोर्ट महिलाओं की स्वतंत्रता खुद ही छीन रही। ऐसी हजारों हिन्दू महिलाएं है जो शादी को मानते हुए भी सिंदूर और शाखा पहनना नहीं पसन्द करती हैं, क्योंकि ये सब महिलाओं पर सामंती पितृसत्ता द्वारा थोपा गया है। क्या कोर्ट के बयान के अनुसार यह सभी महिलाएं अपनी शादियों को अस्वीकार कर रहीं?

दरअसल जिस तरह का सामंती हमारा समाज है कोर्ट की महिला विरोधी अभिव्यक्ति उसी समाज का प्रतिबिंब है। कभी यह खुले रूप में सामने आता है कभी छुपे रूप में। हमारा समाज खासतौर पर महिलाओं को उनके ‘आदर्श भारतीय महिला’ वाले रूप से अलग देखना नहीं चाहता है। यह तमाम कोर्ट- कचहरी, सरकारें, परिवार जैसी संस्थाएं इसी ‘आदर्श रूप’ को बनाये रखने के लिए ही हैं।
यह ऐसा पहली बार नहीं है जब हमारी न्यायव्यवस्था ने महिला विरोधी फैसले दिए हो या महिला द्वेषी टिप्पणी की हो। अगर ठीक से देखे तो इस तरह के फैसलों के अंबार लगा है। अक्टूबर 2016 में भी स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए कि शिकायतकर्ता महिला का व्यवहार इस तरह का नहीं था जैसा बलात्कार के दौरान होना चाहिए, कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था।
यह सोचना अंदर तक हिला कर रख देता है कि किस तरह यह व्यवस्था महिलाओं के प्रति इतना कठोर और असंवेदनशील हो सकता है कि वह इन सब पर भी नियंत्रण रखना चाहता है कि बलात्कार के दौरान या उसके उसके बाद महिलाएं किस तरह से व्यवहार करें। इस तरह के ट्रॉमा के दौरान किस व्यक्ति का शरीर और दिमाग किस तरह से रिएक्ट करेगा इसपर भी समाज ने मानक गढ़ कर रखें है। क्या इस तरह के न्यायालयों से औरतें कभी न्याय की उम्मीद लगा सकती हैं?
इस न्याय व्यवस्था में कभी जाति के कारण, कभी हैसियत के कारण तो कभी सिर्फ महिला होने के कारण हजारो-लाखों महिलाएं न्याय से वंचित रह जाती है। सन 1992 के सितम्बर के भंवरी देवी केस (राजस्थान) को याद करें तो इस केस ने सरकार और कोर्ट के मिलीभगत के साथ-साथ यह भी बताया कि जब भारतीय समाज की दूसरी सबसे मजबूत नींव जाति व्यवस्था और पितृसत्ता का मेल होता है तो उसका रूप कैसा होता है। भंवरी देवी नाम की एक दलित महिला की महिला ने गांव के गुज्जर परिवार में  हो रहे बाल विवाह होने से रोका तो गुज्जर जाति के पांच लोगों लोगों ने भवंरी देवी को उसकी ‘औकात’ बताने के लिए सामूहिक बलात्कार किया। पुलिस से लेकर तत्कालीन सरकार के बड़े बड़े नेताओं ने मामले को दबाने की भरपूर कोशिश की। मामला जब निचली अदालत में गया तब अदालत ने सभी आरोपियों को बरी करते हुए फैसला दिया कि-
’गांव का प्रधान कभी बलात्कार नहीं कर सकता।
’60 साल का बुजुर्ग व्यक्ति कभी भी किसी का बलात्कार नहीं कर सकता।
’आरोपियों में चाचा भतीजा भी शामिल हैं। कोई भी व्यक्ति अपने रिश्तेदार के सामने किसी महिला का बलात्कार नहीं कर सकता।
’ ऊंची जातियों के लोग अशुद्ध नीची जाति की महिला का बलात्कार नहीं कर सकता क्योंकि इससे सभी अशुद्ध हो जाएंगे।
’ कोई पति अपने पत्नी का बलात्कार होते नहीं देख सकता।
अभी मामला हाईकोर्ट में है जिसमें आजतक मात्र एक सुनवाई हुई है और इसी तरह दो दशक से भंवरी देवी न्याय का इंतजार कर रही है। अदालत के इस फैसले में किस हद का महिला द्वेष भरा पड़ा है ये देख पाना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है, विशेषतौर पर नीची जातियों के महिलाओं के प्रति। इसी फैसले के साथ इस अदालत ने इन सभी बलात्कारों को झूठा ठहरा दिया जो ऊंची जाति के लोगों ने नीची जाति के लोगों को उनकी औकात बताने के लिए की थीं।
एक अन्य पहलू पर बात करें तो जिन न्यायाधीशों पर न्याय देने के जिम्मेदारी है उनमें कई न्यायाधीशों पर खुद ही महिलाओं यौन शोषण का आरोप है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर उनकी एक पूर्व महिला कर्मचारी ने उनपर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इस मामले को देखने के लिए तीन सदस्यीय कमिटी भी बनी जिन्होंने मुख्य न्यायाधीश को बेगुनाह पाया और सभी आरोपों को निराधार बता दिया। गौरतलब है इस कमिटी पर सही न्यायिक प्रकिया नहीं अपनाने के आरोप भी लगे थे। जब स्वयं मुख्य न्यायाधीश पर इस तरह के गम्भीर आरोप लग रहे तो इस न्याय व्यवस्था की सच्चाई उघड़ के सामने आ जाती है।

कुल मिलाकर यह कहना कि इस तंत्र के बाकी संस्थाओं की तरह ही यह न्याय व्यवस्था खुद ही पितृसत्ता से लिपटी हुई है, यह जरा भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। कभी ‘आदर्श भारतीय महिला’ की विशेषता बताते हुए तो कभी औरतों की सिंदूर लगाना या न लगाने की छोटी सी चॉइस को ही शादी की प्रमाण घोषित करते हुए, कभी दर्ज बयान को ठीक से पढ़े जाने की मांग करने पर सर्वाइवर  और उसका साथ देने वालों को ही जेल भेज देने तक कोर्ट की असलियत को ढकने वाला मुखौटा नीचे सरक ही जाता है और उनका भद्दा महिला विरोधी चरित्र दिखने ही लगता है। जब बुद्धिजीवी और ‘न्याय’ करने वाले खुद ही इस तरह की मानसिकता में जकड़े होंगे तो इस समाज में किस तरह की सोच महिलाओं के प्रति होगी ये समझना मुश्किल बिल्कुल नहीं है।
अररिया रेप सर्वाइवर खुद को जेल भेजे जाने पर कहती हैं ‘हम अगर गरीब नहीं होते तो मेरी बात सुनी जाती ना ? हमारी आवाज तेज है शायद हम ऊंचा बोलते हैं। क्या मेरा ऊंचा बोलना गलत था?’ एक महिला का यह कहना निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट से बनी न्याय व्यवस्था को गरीब विरोधी, महिला विरोधी प्रमाणित कर देता है। कोरोना लॉकडाउन के दौरान महिलाओं पर बढ़ती हिंसा का राज भी इससे ही उजागर हो जाता है।
 
सभी चित्र -अनुप्रिया

Thursday, 23 July 2020

वरवर राव इस देश की चेतना हैं - मनीष आज़ाद

समुद्र न भी हूं फिर भी
मैं स्वयं समुद्र की गर्जना हूं
समुद्र का मुख हूं।
.....तूफान से प्रेम करने वाला गीत हूं मैं
तूफान का संकेत हूं मैं। 
--वरवर राव

मुक्तिबोध ने 1964 में अपनी महत्वपूर्ण कविता 'अंधेरे में' लिखी। मुक्तिबोध की कविताओं में 'बेचैनी' मूल स्वर है। लेकिन यह बेचैनी यूं ही नही हैं, बल्कि मानव मुक्ति के रास्ते की तलाश की बेचैनी है। इसलिए सृजनात्मक बेचैनी है। 'मुझे पुकारती हुई पुकार कहीं खो गयी'- इस 'पुकार' को दुबारा ढूंढने की बेचैनी है। मुक्तिबोध को यह 'पुकार' नहीं मिली और 1964 में इसी बेचैनी में उनकी मृत्यु हो गयी। ठीक इसी समय तत्कालीन आन्ध्र प्रदेश में मुक्तिबोध जैसा ही एक और बेचैन युवा कवि आकार ले रहा था। उसका नाम था- 'पेन्द्याला वरवर राव'। लेकिन वरवर राव को मुक्तिबोध जितना नहीं भटकना पड़ा और उन्हें जल्द ही 'नक्सलबाड़ी की बसंत गर्जना' में अपनी 'पुकार' मिल गयी। और उनकी 'बेचैनी' 'गर्जना' में तब्दील हो गयी।  मुक्तिबोध का नया 'काव्य जन्म' हो गया।
दाहिनी तरफ़ युवा वरवर राव  
वरवर राव की रचनाओं का सच अपने समय के क्रान्तिकारी आन्दोलन के सच के साथ उसी तरह गुंथा हुआ है जैसे उपरोक्त कविता में समुद्र के साथ समुद्र की गर्जना गुथी हुई है। वरवर राव अपने समय के क्रान्तिकारी आन्दोलन की उसी तरह साहित्यिक अभिव्यक्ति हैं, जिस तरह श्रीकाकुलम क्रान्तिकारी आन्दोलन की साहित्यिक अभिव्यक्ति सुब्बाराव पाणिग्रही, बंगाल के नक्सलवादी आन्दोलन की साहित्यिक अभिव्यक्ति सरोज दत्त या तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष की साहित्यिक अभिव्यक्ति मखदूम मोउनुद्दीन थे।
भारत के बाहर जैसे लोर्का, काडवेल, राल्फ फाक्स आदि स्पेनिश गृह युद्ध में जनवाद के समर्थन में फासीवाद के खिलाफ संघर्षो से जुड़े थे, ठीक वैसे ही वरवर राव भी अपने समय के फासीवाद के खिलाफ चल रहे क्रान्तिकारी आन्दोलन से जुड़े हुए है।
फ्रांस में 1968 के अभूतपूर्व छात्र आन्दोलनों और कुछ ही समय पहले फ्रांस के उपनिवेश अल्जीरिया में चल रहे सशस्त्र स्वतंत्रता आन्दोलन को अपना समर्थन देने के कारण 'ज्या पाल सात्र' को गिरफ्तार करने की मांग शासक वर्गो की तरफ से उठने लगी तो फ्रांस के तत्कालिन राष्ट्रपति 'चार्ल्स दि गाल' ने कहा कि सात्र फ्रांस की चेतना हैं और चेतना को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। ठीक इसी तरह वरवर राव भी भारत की चेतना हैं। और हमारी सरकार ने भारत की चेतना को कैद करने की बेवकूफ़ी भरी हरकत की है. वरवर राव की रिहाई की मांग के साथ इस चेतना का भी विस्तार हो गया है।

वरवर राव ने कहीं लिखा है- 'लेखक इस धरती का प्रथम नागरिक है।' हमारे लिए हमारे वरवर राव भारत के प्रथम नागरिक है। तुम्हारा प्रथम नागरिक राष्ट्रपति भवन या एंटीलिया में हजारों सेवकों के बीच ऐशो आराम में रहता है, जहां जनता के खिलाफ योजनाएं बनाई जाती है और उन पर सुनहरे दस्तखत किये जाते है। हमारा प्रथम नागरिक अकेले, अंधेरी कारा में पेशाब से लथपथ है। इसे नहीं सहा जा सकता। आज के आन्दोलन के मुहावरे में कहें तो 'सब याद रखा जायेगा और सबका हिसाब किया जायेगा।' वरवर राव के शब्दों में ही तुम्हें यह चेतावनी हैं-

                                    'मैंने बम नहीं बांटा था

                                    ना ही विचार

                                       तुमने ही रौंदा था

                                       चीटिंयों के बिल को

                                       नाल जड़े जूतों से

                               रौंदी गई धरती से, तब फूटी थी प्रतिहिंसा की धारा।'

वरवर राव हमारे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योकि वे उस धारा के कवि हैं जो बुत में जान फूंकता है ना कि जीवन को बुत बनाता है- 'जीवन को बुत बनाना शिल्पकार का काम नहीं, पत्थर को जीवन देना उसका काम है।' वरवर राव का महत्व आज के इस फासीवादी दौर में और भी बढ़ जाता है जहां कवि पर अपनी ही कविता की हत्या करने का दबाव बढ़ता जा रहा है। याद कीजिए 'सुरजीत पातर' की वह कविता- 'तुम कवि हो या कविता के हत्यारे।' ऐसे ही कवियों को संबोधित करते हुए वरवर राव कहते हैं- 'मत हिचको ओ शब्दों के जादूगर, जो जैसा है वैसा कह दो, ताकि वह दिल को छू ले।'
वरवर राव की एक अन्य महत्वपूर्ण और बेहद प्रतीकात्मक कविता है- 'तिथियों को शहद के छत्ते की तरह हिलाइये, तो वे सच्चाई के डंक मारेंगी।' वरवर राव ने अपनी कविताओं, आलोचनाओं और जन वक्तव्यों में ना जाने कितनी ही महत्वपूर्ण तिथियों को शहद के छत्ते की तरह हिलाया और उन तिथियों के मिथिकीय आवरण को छीलकर लहूलुहान सच को सामने लाये। सच को जानना कोई निष्क्रिय क्रिया नहीं है। सच्चाई का डंक सहे बिना सच्चाई से साक्षात्कार संभव नही। ऐसी ही एक मिथकीय तिथि है- 15 अगस्त 1947 यानी 'आजादी' का दिन। भारत पाकिस्तान विभाजन के फलस्वरूप बही खून की नदियों, तेलंगाना सशस्त्र संघर्ष को फौजी बूटों तले दबाने, एकीकरण के दौरान हैदराबाद व जम्मू में सुनियोजित मुस्लिम जनसंहार के बीच से ही यह तथाकथित आजादी का बोनसाई पौधा पनपा था और तब से लेकर आज तक यह अपना पोषण इस देश की मिट्टी से नहीं बल्कि क्रान्तिकारियों के खून और जनता के दमन से पा रहा है। वरवर राव अपनी कविता में शासक वर्ग को डांटते हुए कहते है- 'जनदमन को जनतंत्र कहते हो।' यदि सचमुच में जनतंत्र होता तो भारत की 'चेतना' को गिरफ्तार ही क्यों किया जाता।

वरवर राव सहित 11 लोगों को जिस तरह भीमाकोरेगांव के फर्जी केस में फंसाया गया है, उसके बारे में वरवर राव ने बहुत पहले ही एक अलग अंदाज में अपनी कविता में इस तरह बयां किया है- 'अगर मैं लिखूं तुम्हारी अनुपस्थिति में मेरा दिल फटता है, तो शायद वे कहें कि संसद को उड़ा देने का षडयत्र है यह, और मुझे आतंक वाले कानून में गिरफ्तार कर ले।' इसी से मिलती जुलती मुनव्वर राना की कविता याद आती है- 'उसने मुझे बलवाई समझा है, क्योकि मेरे घर के बर्तन पे आईएसआई लिखा है।'
मुक्तिबोध की एक कविता है- 'कविता में कहने की आदत नहीं, फिर भी कह दूं, यह समाज चल नहीं सकता, पूंजी से जुड़ा हदय बदल नहीं सकता।' वरवर राव ने भी अपनी कविताओं में उन कड़वी बातों को कहा हैं जिसे कहने की आम तौर पर कवियों की आदत नहीं रही। मुठभेड़ प्रेमी पुलिस के लिए यह लाइन वरवर राव ही लिख सकते हैं- 'इनकाउन्टर के खून से रोज नहाकर भी प्यासी रह जाने वाली पुलिस।' उनकी कविता 'सीधी बात' की यह पंक्ति देखिये- 'नक्सलबाड़ी का तीर खींचकर जब खड़े हो, मर्यादा में रहकर बोलना सम्भव नहीं।' इसी मर्यादा में रहने के कारण ही बहुत से कवियों की कविताएं नख दन्त विहीन हो जाती है। इस सन्दर्भ में धूमिल की 'पटकथा' में वह प्रसिद्ध पंक्ति याद कीजिए- 'हवा में मुट्ठी भी तनी रहे और कांख भी ढकी रहे।'
'लू शुन' जब फ्रांस में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे, तभी उन्हें यह अहसास हुआ कि डाक्टर बनकर मैं ज्यादा से ज्यादा यही कर सकता हूं कि एक गुलाम को स्वस्थ गुलाम बना दूं। लेकिन सवाल तो गुलामी खत्म करने का है। इसके बाद वे मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर वापस चीन आ गये और चीन के तत्कालीन जनयुद्ध के साथ जुड़कर लेखन का कार्य करने लगे। माओ ने उन्हें सांस्कृतिक सेना के सेनापति की संज्ञा दी। वरवर राव भी लू शुन के उसी ऐतिहासिक काम को भारत में अंजाम दे रहे है। वे भारत की सांस्कृतिक सेना के सेनापति है। इस सेनापति की रिहाई हमारे लिए जीवन मरण का प्रश्न है।

'ख्वाजा अहमद अब्बास' ने 'मखदूम मोउनुद्दीन' के लिए कहा था- 'उनकी कविताओं में बारूद की गंध, और चमेली की सुगंध दोनो है।' यह बात वरवर राव की कविताओं के लिए कही अधिक सच है। आज जिस तानाशाह की कैद में वरवर राव हैं उसी तानाशाह की कैद में कविता के अन्य विषय पहाड़, नदी, फूल पत्तियां और खुशबू भी हैं। वरवर राव ने खुद लिखा है कि जब फूल, पत्तियों, नदियों, पहाड़ों पर तानाशाह का कब्जा हो जाता है तो क्या फूल, नदी, पहाड़ पर लिखना बिना तानाशाह पर लिखे सम्भव है? इसलिए आज वरवर राव को आजाद कराना फूल, पत्तियों नदी, पहाड़ों को आजाद कराना है।
आइये वरवर राव की रिहाई की आवाज को और तेज करे। उनकी कविताओं में मौजूद सपनों को जमीन पर उतारने का प्रयास और तेज करें।

Thursday, 9 July 2020

आरक्षण खैरात नहीं वंचितों और शोषितों का हक है- रितेश विद्यार्थी


गत 11 जून 2020 को एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है। तमिलनाडु के विभिन्न राजनीतिक दलों ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) के तहत मेडिकल साइंस में प्रवेश के लिए आयोजित किये जाने वाले NEET परीक्षा में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 50% आरक्षण की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक मुकदमा दायर किया था। इस मुकदमे की सुनवायी करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एल नागेश्वर राव, कृष्ण मुरारी और एस रविन्द्र भाटिया ने कहा कि, "आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है, आप इस मुकदमे को लेकर मद्रास हाई कोर्ट जाएं।"

यह कोई पहला मामला नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कहा है। इसके पहले भी 7 फरवरी 2020 को उत्तराखंड सरकार के एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नागेश्वर राव, हेमंत गुप्ता व मनोज कुमार की पीठ ने कहा था कि राज्य सरकार आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है। न तो नियुक्तियों में और न ही प्रमोशन में क्योंकि आरक्षण मूलभूत अधिकार नहीं है। वैसे तो आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख भारत का संविधान लागू होने के समय से ही आरक्षण विरोधी रहा है। लेकिन इधर मोदी के आने के बाद से यानी जब से देश में ब्राह्मणवादी फासीवाद और हमलावर हुआ है, न्यायपालिका भी खुल कर मनुपालिका की मुद्रा में आ गयी है।

आरक्षण भारत की राजनीति के सबसे विवादित विषयों में से एक है। आरक्षण को समझने के लिए आइये एक नजर भारत के इतिहास पर डालते हैं। भारतीय समाज हजारों वर्षों से वर्ण और जाति के आधार पर बंटा हुआ है। सदियों से चले आ रहे ऊंच- नीच पर आधारित ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था के अभ्यास के परिणामस्वरूप भारत अनेक जातियों और उपजातियों में विभाजित होता गया। परंपरागत रूप से चली आ रही जाति व्यवस्था में निचली जातियों के साथ घोर उत्पीड़न और असमानता का व्यवहार हुआ है। शिक्षा और संपत्ति के अधिकार सहित उनके विभिन्न तरह के अधिकारों को कुचला गया है। मनु स्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार जाति एक "वर्णाश्रम धर्म"  है। यानी सभी जातियों और वर्णों के लिए कुछ खास तरह के काम निर्धारित कर दिए गए हैं। कोई भी वर्ण या जाति अपने लिए निर्धारित सीमा का उल्लंघन नहीं कर सकती। मनुस्मृति ने शूद्रों और अतिशूद्रों को शिक्षा, संपत्ति और शस्त्र तीनों के अधिकार से वंचित रखा।  शिक्षा प्राप्त करने की वजह से एक आदिवासी युवा धनुर्धर एकलव्य का अंगूठा काट लिया गया। एक दलित संबुक की हत्या कर दी गयी। सूत पुत्र होने की वजह से महान धनुर्धर कर्ण को अपमानित किया गया। जाति आधारित अन्याय के इस तरह के हजारों उदाहरण हमारे इतिहास और वर्तमान में मौजूद हैं। साथ ही साथ चार्वाकों, बौद्धों, सिद्धों, नाथों, कबीर और रैदास के वर्ण व्यवस्था विरोधी आंदोलनों का भी हमारे देश में एक लंबा इतिहास है।

16 वीं शताब्दी में भारत में व्यापार के लिए अंग्रेजों का आगमन हुआ। प्लासी के युद्ध 1757 से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 तक अंग्रेजों ने पूरी तरह भारत पर अपना शासन व नियंत्रण स्थापित कर लिया। 1857 से 1947 तक भारतीय समाज पूरी तरह औपनिवेशिक दासता में जकड़ा हुआ एक ब्राह्मणवादी अर्धसामंती समाज था। पूरी 19वीं और 20वीं सदी अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद व ब्राह्मणवादी सामंतवाद से मुक्ति के लिए चल रहे संघर्ष की सदी थी। एक ओर जहाँ पूरा देश ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति चाहता था वहीं इस देश की बहुसंख्यक आबादी हजारों वर्षों से चली आ रही जातिव्यवस्था और सामंतवाद से भी मुक्ति चाहती थी।  जातिव्यवस्था विरोधी आंदोलन भी 19 वीं शताब्दी में जोर पकड़ने लगे, खासकर महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में। पेरियार, ज्योतिबा फुले, बाबा साहेब अम्बेडकर, छत्रपति साहूजी महाराज और अन्य आंदोलनकारियों ने पिछड़े वर्गों की स्थिति में सुधार के लिए और जातिव्यवस्था के खात्मे के लिए अथक प्रयास किया। विश्व के पैमाने पर भी अगर देखें तो पूरी 19वीं और 20वीं सदी सामंतवाद और उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों की सदी है। इस सदी में यूरोप के तमाम देश स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के नारे के साथ अपने देश व समाज के जनवादीकरण के लिए संघर्षरत थे।

अगर हमें भारत की वर्तमान स्थिति को समझना है, भारत में आरक्षण की व्यवस्था को समझना है तो हमें भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को भी समझना होगा। 1947 में आज़ादी के नाम पर हुए सत्ता के स्थानांतरण को समझना होगा। स्वतंत्रता आंदोलन में संघर्षरत जनता की यह आकांक्षा थी कि आजादी के बाद एक ऐसे भारत का निर्माण होगा, जहाँ सब कुछ सबके लिए होगा। जाति, धर्म, लिंग और भाषा के आधार पर किसी के साथ कोई भेद भाव नहीं होगा। जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कर दिया जाएगा और देश में क्रांतिकारी भूमि सुधार लागू होगा। लेकिन जैसा कि भगत सिंह ने 1930 में ही यह कहा था कि गोरे अंग्रेज़ चले जाएं और काले अंग्रेज़ गद्दी पर बैठ जाएं तो इससे आज़ादी नहीं आने वाली है। हुआ भी यही ब्रिटिश पार्लियामेंट में पास सत्ता हस्तानांतरण अधिनियम के तहत अंग्रेजों ने सत्ता अपने दलालों के हाथ में सौंप दी। न तो पूरी तरह से देश को साम्राज्यवादी शोषण से मुक्ति मिली और न ही ब्राह्मणवादी सामंतवाद से। आज़ादी, बराबरी और न्याय की बातें एक छलावा साबित हुईं।

गांधी, नेहरू और पटेल ने एक साजिश के तहत उन बाबा साहेब अंबेडकर को संविधान सभा में शामिल कर लिया जिनके बारे में पटेल ने कभी कहा था कि, "आम्बेडकर के लिए संविधान सभा के दरवाजे तो क्या, खिड़कियां तो क्या, रौशनदान तक बंद हैं।" आंबेडकर को संविधान सभा में इसलिए शामिल किया गया ताकि दलितों और वंचितों का भरोसा उस संविधान सभा पर बना रहे। अम्बेडकर को सामंतों, रजवाड़ों और दलाल पूंजीपतियों से खचाखच भरी संविधान सभा में प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। जिसके लिए बाद के वर्षों में अम्बेडकर को बार- बार यह बोलना पड़ा कि मुझे भाड़े के लेखक के तौर पर इस्तेमाल किया गया।

स्वतंत्रता आंदोलन की आकांक्षाओं और डॉ. अम्बेडकर के अथक प्रयासों के फलस्वरूप संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया। आज सुप्रीम कोर्ट यह कह रहा है कि आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं है। आरक्षण पर अपनी बात रखते हुए बाबा साहेब अम्बेडकर ने यह कहा था कि जाति व्यवस्था के कारण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ऐतिहासिक रूप से पिछड़े रहे और उन्हें भारतीय समाज में सम्मान तथा समान अवसर नहीं दिया गया और इसीलिए राष्ट्र-निर्माण के लिए यह जरूरी है कि सरकार शिक्षण संस्थाओं व सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए उसकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दे ताकि भारतीय समाज के मुख्य धारा में वो अपना उचित स्थान प्राप्त कर सकें और तमाम संस्थाओं में उनका समुचित प्रतिनिधित्व हो सके। बाद में, अन्य वर्गों के लिए भी आरक्षण शुरू किया गया। विंध्य के दक्षिण में प्रेसीडेंसी क्षेत्रों और रियासतों के एक बड़े क्षेत्र में पिछड़े वर्गों (बीसी) के लिए आजादी से बहुत पहले आरक्षण की शुरुआत हुई थी। महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्गों को राज्य प्रशासन में उन्हें उनकी हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षण का प्रारम्भ किया था। कोल्हापुर राज्य में पिछड़े वर्गों/समुदायों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिए 1902 में अधिसूचना जारी की गयी थी। यह अधिसूचना भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाला पहला सरकारी आदेश है। इससे पहले ज्योतिबा फुले ने 1882 में अंग्रेजों द्वारा गठित हंटर आयोग के समक्ष नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के साथ सरकारी नौकरियों में सभी के लिए आनुपातिक आरक्षण/प्रतिनिधित्व की मांग की थी।
अब आइये आरक्षण के सैद्धांतिक आधार पर बात करते हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के आकांक्षाओं और अंतराष्ट्रीय परिस्थितियों के दबाव में भारत के संविधान में समानता के अधिकार को मौलिक अधिकार के बतौर शामिल किया गया। समानता का वास्तविक मतलब ये होता है कि समान व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जाएगा। समानता का मतलब ये कत्तई नहीं होता कि असमान व्यक्तियों के साथ भी समान व्यवहार किया जाएगा। समानता के अधिकार का मतलब ये है कि समाज के कमजोर तबकों के लिए कुछ विशेष अवसर के प्रबंध किए जाएंगे। इस देश में दलित, पिछड़े और महिलाएं वो वर्ग हैं जो सदियों से जमीन, प्राकृतिक संसाधन, शिक्षा और सम्मान से वंचित हैं। उनको उच्च वर्गों के बराबर लाने के लिए व  सभी क्षेत्रों में उनके न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया।

यह बात जरूर है कि आरक्षण सीधे तौर पर मौलिक अधिकार नहीं है। परंतु बराबरी का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। आरक्षण का सिद्धांत सभी समुदायों के उचित प्रतिनिधित्व की बात करता है जिससे वंचित और पिछड़ी जातियों को बराबरी के स्तर तक लाया जा सके। ताकि वो खुद को एक बराबर का नागरिक और सम्मानित इंसान महसूस कर सकें।

संविधान का अनुच्छेद 46 जो कि नीति निर्देशक सिद्धांत में शामिल है वह पिछड़े वर्गों और समुदायों मुख्य रूप से एस सी- एस टी पर विशेष ध्यान देने की बात करता है। सुप्रीम कोर्ट भी अब यह मानती है कि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक सिद्धान्त दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। बराबरी का अधिकार मूल अधिकार है। और बराबरी हो ही तब सकती है जब दबे कुचलों को विशेष प्रबंध द्वारा ऊपर लाया जाए। इस तरह आरक्षण एक मौलिक अधिकार बन जाता है। सच्चाई तो यह है कि आरक्षण तो अब वैसे ही अर्थहीन होता जा रहा है। क्योंकि आरक्षण सिर्फ सरकारी क्षेत्र में है और मात्र एक प्रतिशत ही सरकारी नौकरियां हैं। वो भी तेजी से होते निजीकरण के दौर में कब तक और कितनी बची रहेंगी कह पाना मुश्किल है।
अगर देश की तमाम संस्थाओं में तथाकथित उच्च जातियों की एक मात्र जाति ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व देखें तो वो लगभग इस प्रकार है- लोकसभा में 48%, राज्यसभा में 36%, गवर्नर 50%, सेंट्रल गवर्नमेंट में 57%, राज्य सरकारों में 80%, बैंक में 51%, टीवी-रेडियों में 83%, सेक्रेटरी 54%, वीसी 51%, सुप्रीम कोर्ट में 60%। जबकि देश मे ब्राह्मणों की कुल आबादी मात्र 3% है। अब आप बाकियों के प्रतिनिधित्व का अंदाजा लगा सकते हैं।

आरक्षण की बात आते ही समाज का एक सुविधा सम्पन्न तबका मेरिट का रोना रोने लगता है। अशोक कुमार गुप्ता वर्सेज स्टेट ऑफ यूपी 1977 के एक मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट भी यह कहता है कि "मेरिट और एफिशिएंसी पूरी तरह एक आर्यन विचारधारा है। ताकि उनकी सत्ता व  एकाधिकार बना रहे।" मेरिट की बात तब होनी चाहिए जब सबकी परवरिश समान सुविधाओं में और समान तरीके से हो। जिनके साथ जाति के आधार पर हजारों साल अन्याय हुआ है। उन्हें विशेष अवसर दिए बगैर समाज में कभी भी बराबरी और न्याय स्थापित नहीं हो सकता। पूना पैक्ट, संविधान सभा से लेकर अब तक आरक्षण सामाजिक आधार पर दिया गया है और ऐतिहासिक तौर पर हुए अन्यायों के लिए दिया गया है। आरक्षण समानता के सिद्धांत का ही विस्तार है। इस तरह आरक्षण एक मौलिक अधिकार है।
   



Sunday, 28 June 2020

जाॅर्ज फ्लाॅयड की हत्या और हालिया अमरीकी जन विक्षोभ- तुहिन देब


 गत 25 मई को ऐसी घटना घटी जिसने वैश्विक स्तर पर कोरोना के आंतक सेे आतंकित विश्व को झकझोर दिया। 25 मई को अमरीका के मिनियापोलिस शहर में अश्वेत अमरीकी नागरिक जाॅर्ज फ्लाॅयड को पुलिस हिरासत में मार डाला गया था। फ्लाॅयड पर नकली बिल के जरिए भुगतान करने का आरोप था। हत्या के वीडियो के वायरल होने के बाद अमेरिका की जनता में जबरदस्त नाराजगी फैली। इस वीडियो में डेरेक शाॅविन नामक श्वेत पुलिस अधिकारी, जाॅर्ज फ्लाॅयड की गर्दन पर घुटना टेककर उसे दबाता हुआ दिखता है जिससे जाॅर्ज की मौत हो जाती है। जाॅर्ज, पुलिस अधिकारी से ‘‘आई कान्ट ब्रिद’’ कहकर उसे छोड़ने की अपील करते हैं लेकिन, पुलिस अधिकारी पर इसका कोई असर नहीं होता। वह घुटने से दबाकर 46 वर्षीय जाॅर्ज फ्लाॅयड को मार डालता है। विडियो को दुनिया भर के लोगों ने देखा।
जाॅर्ज की गर्दन पर घुटना दबाकर मारने वाले पुलिस अधिकारी डेरेक शाॅविन को गिरफ्तार कर लिया गया है और उस पर हत्या के आरोप लगाए गए हैं। इस घटना के संबंध में अब तक 4 पुलिसकर्मियों को बर्खास्त किया जा चुका है। घटना के बाद अमेरिका के 75 से अधिक शहरों में जनविक्षोभ फुट पड़ा। गोरे-काले मिश्रित जनता नस्लवाद के खिलाफ उदारवादी, शांतिवादी विचारधारा से प्रभावित जनता ने ‘‘ब्लैक लाइव्स मैटर’’, ‘नस्लवाद अमेरिका की महामारी है’ ‘‘पुलिसी कु्ररता खत्म करो’’ और ‘‘निर्दोषांे की हत्या बंद करो’’ जैसे नारे लिखी हुई तख्तियाॅं और बैनर लेकर लाखों-लाख लोग न्यूयार्क सहित तमाम शहरों की सड़कों पर प्रतिरोध में उतर आए। न्यूयाॅंर्क सिटी के मेयर बिल डी ब्लासियो भी प्रदर्शन में शामिल हुए। प्रदर्शन मे शामिल लोग जाॅर्ज फ्लाॅयर्ड के लिए न्याय की मांग करते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी तारतम्य में पुलिस कु्ररता और पूंजीवादी सामाजिक दमन के खिलाफ अमेरिका, ब्रिटेन, डेनमार्क, जर्मनी, फ्रांस, न्यूजीलैण्ड, आॅस्ट्रेलिया और कनाडा समेत दुनिया के कई देशों में जागरूक जनता लाॅक डाउन के बावजूद जबरदस्त प्रदर्शन कर रही हैं। ब्रिटेन मे जनता के प्रदर्शन के दौरान 18वी शताब्दी के एक दास व्यापारी एडवर्ड कोलस्टन की मूर्ति को ध्वस्त कर दिया है।
इधर अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय व्हाइट हाउस के बाहर प्रदर्शनकारियों को जबरन हटाने के कारण अमेरिका की संघीय अदालत में राष्ट्रपति ट्रम्प के खिलाफ अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन (एसीएलयू) और ‘ब्लैक लाईव्स मैटर’ ने मुकदमा दायर किया है। हयूस्टन के पुलिस प्रमुख ने ट्रंप को अनावश्यक बोल कर विवाद पैदा न करने की नसीहत दी है। अमेरिका के पूर्व विदेशमंत्री काॅलिन पावेल ने भी राष्ट्रपति ट्रम्प के नस्लभेद विरोधी प्रदर्शनों से निपटने के तरीके की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने संविधान से हटकर काम किया है। नेशनल गार्ड के अधिकारियों ने कहा है कि हमारे पास एक संविधान है और हमें उस संविधान का पालन करना है। इधर अमेरिका में नस्लभेद विरोधी, पुलिस अत्याचार विरोधी, सामाजिक न्याय के लिए हो रहे जंगी प्रदर्शन के दरम्यान फिर एक अश्वेत नागरिक पुलिस जुल्म का शिकार हो गया जब अटलांटा में 12 जून को वैंडी रेस्टोरेंट की पार्किंग में अश्वेत रेशार्ट बु्रक्स को पुलिस अधिकारी जैरेट रोल्फ ने शरीर के पिछले हिस्से में 2 गोली मारकर हत्या कर दी। बु्रक्स की हत्या ने जाॅर्ज फ्लाॅयड की हत्या से उपजे आग को और भड़का दिया है।
जाॅर्ज फ्लाॅयड का जन्म अमेरिका के नाॅर्थ कैरोलिना में हुआ था और उन्होंने ह्यूस्टन में अपने जीवन का लम्बा वक्त गुजारा था। नस्लभेद और पुलिस बर्बरता के खिलाफ देशव्यापी जंगी प्रदर्शनों के बीच ह्यूस्टन में जाॅर्ज फ्लाॅयड का अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान 6000 से अधिक लोग उन्हें अंतिम विदाई देने और श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा हुए थे। पेशेवर मुक्केबाज फ्लाॅयड मेवेदर ने जाॅर्ज के अंतिम संस्कार का पूरा खर्च उठाया।
आंदोलन का चरित्र जंगी और पंूजीवादी व्यवस्था विरोधी हो गया। बड़े स्तर पर तोड़फोड़ हुई और जनता की पुलिस से झड़प की घटनाएं भी सामने आई। आंदोलन इतना विशाल हो गया कि जनता ने वाशिंगटन में राष्ट्रपति निवास व्हाईट हाउस पर धावा बोल दिया और दुनिया के साम्राज्यवादियों के सरगना ट्रम्प को बंकर में शरण लेनी पड़ी। अमरीकी साम्राज्यवाद को इस आंदोलन ने हिलाकर रख दिया है और जनता की ताकत का शानदार नमूना पेश किया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस आंदोलन के लिए जनता को दोष दे रहे हैं और अप्रत्यक्ष रूप से नस्लवाद का समर्थन करते हुए दिख रहे हैं। उन्होंने पहले तो विरोध प्रदर्शन के दमन के लिए नेशनल गार्ड को तैनात किया फिर इस कदम के खिलाफ उठ रहे प्रबल विरोध को देखते हुए वाशिंगटन डी.सी. से नेशनल गार्ड की वापसी का आदेश दिया। दूसरी ओर हम देखते हैं कि मिनियापोलिस शहर के पुलिस कर्मियों ने  घुटनों के बल बैठ कर सार्वजनिक रूप से जनता से इस कृत्य के लिए माफी मांगा। इस बात की हम भारत देश में कल्पना भी नहीं कर सकते। अमेरिका के मिनियापोलिस शहर की नगर परिषद ने बहुमत के साथ स्थानीय पुलिस विभाग को खत्म करने का संकल्प लिया है। उनका कहना है कि शहर में नागरिक सुरक्षा का नया माॅडल बनाया जायेगा।

‘‘आई कांट ब्रीद’’ (मैं सांस नहीं ले पा रहा हॅूं) यह वाक्य पहले भी कई बार कहा जा चुका है-2014 में न्यूयार्क सिटी के एक कोने में एक निहत्थे अश्वेत एरिक गार्नर की हत्या के बाद छतों पर से और राष्ट्रीय बास्केटबाॅल संघ (एनबीए) के खिलाड़ियों की जर्सियों पर लिखा हुआ था। मिस्टर गार्नर की मौत पर ढेरों कवरेज के बाद भी, जैसा होता रहा है, इस घटना के पश्चात कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है। पिछले दशक में अमेरिका ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के चक्र में फंसता ही चला गया है जिसमें ज्यादातर घटनाओं में निहत्थे अश्वेत लोग पुलिस द्वारा मारे गये और जिनकी संख्या बढ़ती ही चली गई है। इनमें उन हत्यारों के खिलाफ कोई विशेष कार्यवाही नहीं हुई और वे वर्दी के पीछे छिपकर आराम से घूमते रहे।
दशकों से अफ्रीकी-अमेरिकन अपने पास-पड़ोस में पुलिस के दुव्र्यवहार की शिकायतें करते रहे हैं। इस स्थिति में ज्यादातर अमेरिकीयों ने उपेक्षा ही की, चाहे उनके अस्तित्व को उन्होंने पूरी तरह से इनकार नहीं किया हो। स्मार्ट फोन व तकनीकी विकास ने लोगों को उनकी अपनी आंखों से पुलिसिया ताकत के दुरूपयोग की सच्चाइयों को देखने का मौका दिया। जार्ज फ्लाॅयड की हत्या से उपेक्षा का यह गुब्बारा पूरी तरह फूट गया। डेरेक शाॅविन द्वारा फ्लाॅयड की गर्दन को अपने घुटने से 8 मिनट तक दबाए रखने के इस विडियों में अधिक चिंताजनक बात यह है कि मानों इतना ही पर्याप्त नहीं था और एक या दो नहीं बल्कि तीन अधिकारी वहाॅं मौजूद थे। कोई कार्यवाही करने की बजाय वे मूर्ति बनकर खड़े रहे जब फ्लाॅयड जान की भीख मांग रहा था तथा मदद की गुहार लगा रहा था।
ऐसे समय में मौन काफी कुछ कहता है, और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के मौन से अधिक मुखर किसी की चुप्पी नहीं है। मुक्त विश्व के नेता के जरिए एक टिवटर पेज से व्यथित कर देने वाले कंटेंट का प्रसार होता है। एक कहता है- सचमुच महान काम की रिपोर्ट। प्रेसिडेंट ट्रम्प आप जोरदार चल रहे हैं (बचकाना लेकिन सत्य) ! कोई और कहता है-‘यह तो जबरदस्त जाॅब रिपोर्ट है।’ जब देश दंगों की भेंट चढ़ जाता है, उसका नेता दूसरी तरफ देखने लगता है। फ्लाॅयड की मौत पर कुछ क्षणभंगुर टिप्पणियों और देशव्यापी विरोध के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों द्वारा किये गये नुकसान की आलोचना करते हुए मूल प्रश्न की पूर्णतः उपेक्षा कर दी गई एक व्यवस्थित रंगभेद व चुप्पी के सवालों का जवाब देने की बजाये ट्रम्प ने प्रदर्रूान के तरीकों पर अपना फोकस बनाये रखने को तय किया। न कि वे उसके कारणों पर गये। उन्होंने अमेरिकी पुलिस की समस्या को स्वीकार करने की बजाये कुछ टूटी खिड़कियों का दुखड़ा रोया। ट्रम्प आक्रामक बनते रहे हैं। निर्धारित व्यवहार की सीमाओं को लांघते रहने वाले एक राष्ट्रपति के लिए सटीक कार्यवाही करना इस पद की प्रमुख जिम्मेदारी हैं। संकट की इस घड़ी में जनता अपने नेताओं की ओर देखती है। संवाददाताओं और सरकारी अधिकारियों के लिए गुस्सा और ताकत का बढ़कर प्रदर्शन रंगभेद के अवसर पर कहीं भी दिखाई नहीं दिया, जो ऐसा विषय है जिस पर दुनिया का सबसे वाचाल व्यक्ति सर्वाधिक मौन रहा है। न्याय मांगती लाखों नाराज आवाजों के बीच ट्रम्प कहीं भी नहीं पाए गए।

जब प्रदर्शनकारी व्हाईट हाउस के सामने पहुंचकर उनकी उपस्थिति की मांग करने लगे तो ऐसा लगा जैसे ट्रम्प राष्ट्र को विचलित कर देने वाले इन मुद्दों से टक्कर लेंगे। इसकी बजाये वे छिप गए। विशेषकर एक ऐसे सुरक्षित बंकर में जो व्हाइट हाउस के तलघर में बना हुआ है। जो ट्रम्प खुद की मार्केटिंग शक्तिशाली नेता के रूप में करते रहे हैं, उनके द्वारा कायरता के इस खुले प्रदर्शन से उनकी चुनावी लोकप्रियता अचानक घटी है। प्रदर्शनकारी आने वाले 2020 के चुनाव में अपनी नापसंदगी अपनी पीठों पर जाहिर कर चुके हैं। कुछ हफ्ते पहले यहां तक कि कोविड-19 की महामारी के बीच ट्रम्प पुनर्निवाचन में जीत के तगड़े दावेदार थे। अब उनके और उनके विरोधी जो बिडेन के स्थानों की अदला-बदली हो गई है। क्योंकि एक अमेरिकन ब्राॅडकास्टिंग कंपनी (एबीसी) के अनुसार चुनाव में बिडेन को ट्रम्प पर 8 अंकों की बढ़त मिल गई है। गणना करने वाले कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि अब बिडेन ही पहली पसंद है। हालंाकि बिडेन भी केन्द्रीय आवाज नहीं बन पाये हैं या कहा जाये कि उन्होंने आंदोलन के दौरान आवाज तक नहीं उठाई।
दास प्रथा का खात्मा चाहे डेढ़ सौ साल पहले हो गया हो परंतु उसके विषाणु दुनिया में वैसे ही मौजूद है जिस प्रकार भारत में छुआछुत संवैधानिक तौर पर खत्म तो कर दिया गया है। लेकिन हिंसक जाति व्यवस्था वाले भारतीय समाज में वह अब भी व्याप्त है। सामाजिक व धार्मिक रूप से श्रेष्ठी भाव रखने वाला व विशेषाधिकारों से सज्जित वर्ग इन कानूनी प्रावधानों को नहीं मानता, वैसे ही अनेक गोरों में अश्वेतों के प्रति नफरत का भाव अंतर्मन मंे बना हुआ है। यह जहर रह-रहकर सामने आता है। सड़कों से लेकर राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय मंचों तक अक्सर नस्लीय या रंगभेदवाची टिप्पणियां सामने आती है।
भारत में हर साल क्रिकेट टूर्नामेंट आईपीएल बहुत लोकप्रिय हो चला है। इसमें खिलाड़ियों की अच्छी फीस पर अपने क्लब के लिए अनुबंधित किया जाता है। क्रिकेट खेलने वाले लगभग सभी देशों के खिलाड़ी भारतीयों के साथ मिल जुलकर इसमें खेलते हैं क्रिकेट की ही तरह नस्लीय भेदभाव व रंगभेद का उदय व प्रसार उन्हीं अंगे्रजों की देन है जो या तो यूरोप में रह गये अथवा अमेरिका जाकर बस गये। बहरहाल अगर हम सोचते हो कि एक साथ क्रिकेट या विभिन्न खेल खेलने से नस्लीय भेदभाव कम हुआ होगा। तो ऐसा नहीं है। वेस्टइंडीज के खिलाड़ी डेरेन सैमी हैदराबाद सनराईजर्स की ओर से खेलते रहे हैं। उन्होंने जाॅर्ज फ्लाॅयड की मौत पर उठे तूफान के बीच में बताया है कि जब वे भारत में खेलते थे तो उनका और श्रीलंका के तिसारा परेरा का ‘कालू’ कहकर मजाक उड़ाया जाता था। कैशियस क्ले से मुस्लिम बने मुहम्मद अली सर्वकालिक महान बाॅक्सर थे जिन्होंने तीन बार के हैवीवेट चैंपियन जो फ्रेजियर को आज भी ‘सुपर फाईट’ के नाम से याद किये जाने वाले 1971 के मुकाबले में हराया था। अली ने विश्व चैंपियन का मैडल नस्लवादी टिप्पणी से क्षुब्ध होकर नदी में फेंक दिया था। मोहम्मद अली वो जांबाज अमरीकी प्रतिरोध के प्रतीक थे। जिन्होंने अमरीका द्वारा वियतनाम पर बर्बर आक्रमण के दौरान वियतनाम जाकर सेना की ओर से लड़ने के लिए मना कर दिया था। 
    नस्लीय भेदभाव बहुआयामी है। दास प्रथा के दौरान इसका संबंध जहांॅं सामाजिक या उत्पादन शक्ति में इस्तेमाल तक सीमित था, वहीं कालांतर व हाल के वर्षों में उसका संबंध पूंजीवाद और नवउपनिवेदशवाद से जुड़ता नजर आता है। दास प्रथा के उन्मूलन के बाद पिछले लगभग सौ बरसों में अमेरिका में अश्वेत अस्मिता न सिर्फ जागृत हुई है बल्कि विभिन्न मानवीय गतिविधियों में भी वे खूब आगे बढ़े हंेै। विशेषकर साहित्य, संगीत, खेल आदि में। अनेक एशियाई खासकर भारतीय उपमहाद्वीप, चीनी, लातिन अमेरिकी व अफ्रीकी भी वहां बसे हैं। वे जब अपने परिश्रम व प्रतिभा के बल पर अमेरिकियांें से टक्कर लेने लगे, तो इस मुद्दे का राजनीतिकरण वैसा ही होने लगा जिस प्रकार भारत में सांप्रदायिकता, जातिवाद, प्रांतवाद व भाषावाद का होता है। प्रथम विश्वयुद्ध के दरमियान गदरी क्रांतिकारियों की स्मृति मंे भी हम पाते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी की शुरूआत में भारत के पंजाब से गये प्रवासी मजदूरों को अमरीका व कनाडा में खूनी प्रबल विरोध का सामना करना पड़ा था। अभी अमेरिका को डोनाल्ड ट्रम्प के रूप में ऐसा शासक मिला है जो नस्लवाद और साम्राज्यवाद को भरपूर बढ़ा रहा है। जिस प्रकार भारत में अनेक तरह के भेदभाव को प्रोत्साहित कर उनका राजनैतिक फायदा उठाया जा रहा है। अमेरिका के संदर्भ में यह अच्छी बात है कि उस देश के साथ ही दुनिया भर में खासकर यूरोप में नस्लवाद का जबर्दस्त विरोध हो रहा है। पिछले साल चार अश्वेत महिला सीनेटरों ने भी ट्रम्प की इस प्रवृत्ति का विरोध किया था। भारत में गैरबराबरी विरोधी आवाज कमजोर है, क्योंकि राजनैतिक प्रतिपक्ष अधोगति को प्राप्त हो चुका है, तो जनता ने इसके भावी परिणामों की चिंता किये बगैर इसे स्वीकृत कर लिया है। हमारे शासकों के लिए सांप्रदायिक वा जातिवादी धु्रवीकरण ही चुनाव जीतने की कुंजी है।
वेस्टइंडीज के प्रसिद्ध पेसर माईकल होल्डिंग का यह कहना सही है कि क्रिकेट फुटबाॅल के मैदानों में जो नस्लीय टिप्पणियां करते हैं वे इसी समाज से आते हैं। इसलिए आवश्यक है कि नस्लवाद से पीड़ित यह समाज ही खत्म कर ऐसा समाज रचा जाये जो इनसे ऊपर हो।’
आज जो लोगों का गुस्सा फूट रहा है वो सिर्फ एक घटना की बात नहीं है। हमें याद रखना होगा कि अमेरिका बना ही है अफ्रीकी अमरिकीयों की दासता के बल पर 1492 में कोलम्बस द्वारा अमरीकी महाद्वीप के खोजे जाने के बाद उत्तर और दक्षिण अमेरिका के मूल निवासी - माया. एजटेक, इन्का सरीखे कितने ही जनजातीय समुदाय जिन्हें रेड इंडियन कहा गया का निर्मम रूप से सफाया कर यूरोपीयन उपनिवेशवादियों ने अपनी लूट और विनाश की दुनिया बसाई। उस समय ब्रिटीश, फ्रांसीसी, डच, डेनिश, पुर्तगाली, व स्पेनिश उपनिवेशवादियो ने गुलामो के व्यापार को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया। गुलामो के व्यापार से यूरोपीयन उपनिवेशवादी समृद्धि के शिखर पर पहुंचे। सबसे ज्यादा गुलाम अफ्रीकी महादेश के थे जिन्हें नयी अमरीका बसाने के लिए बड़ी संख्या में भीषण दमन उत्पीड़न के जरिये यूरोपीयन उपनिवेशवादी, जहाजों में भर-भर कर अमरीका लाते थे। उनमें से कई सारे तो भूखे-प्यासे, दम घुंटकर या भीषण अत्याचार से अमरीका के जहाजों में खोल में ही मर जाते थे। जो बच जाते थे वे अमरीका के श्वेत जालिम अमीरों के खेतों-खलिहानों, जंगलों, खदानों में अमानवीय परिस्थिति में पीढ़ी दर पीढ़ी गुलाम बनने के लिए अभिशप्त थे।

    ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ आजाद अमरीका के निर्माण के लिए जाॅर्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में लेक्सिंगटन से शुरू होकर साराटोगा तक जो लम्बा मुक्ति युद्ध चला उसमें भी दासप्रथा के उन्मूलन की मांग उठी थी। अब्राहम लिंकन के समय दक्षिण के दासप्रथा समर्थक राज्यों के खिलाफ लड़ा गया गृह युद्ध और दासप्रथा का खात्मा ऐतिहासिक धटना थी। अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद पहली बार 19 जून 1865 को टेक्सास राज्य में दासों को मुक्त करने की घोषणा की गई थी। इसे जूनटीन्थ कहा जाता है। अमेरिकी संविधान के 13वें अधिनियम के जरिए दासप्रथा का अधिकारिक रूप से खात्मा तो हुआ लेकिन उसमें यह कहा गया कि ‘‘कोई भी व्यक्ति दास नहीं है जब तक वो जेल में न हो।’’ इस चीज का फायदा उठाकर अफ्रीकी अमरीकी लोगों को छोटे-छोटे जुर्मों के जेलों में डाला गया जो आज भी बदस्तुर जारी है। कई बार तो बिना सुनवाई के ही लम्बे समय तक जेल में रहने को मजबूर किया गया। यहां तक कि कई नियम अफ्रीकी अमरीकी लोगों की निशाना बनाने के लिए बनाए गए। जेल के अश्वेत कैदियों से बिना मजदूरी के या सस्ते में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए काम करवाया जाता है। इससे इजारेदार कंपनियों को बहुत फायदा होता है। कई टीकों, दवाओं, गर्भनिरोधकों का अवैध परीक्षण बहुराष्ट्रीय कंपनियाॅं प्रशासन की मिलीभगत से, जेलों में बंद अश्वेतों पर करती हंै।

    दासप्रथा के उन्मूलन के खिलाफ अमेरिका के दक्षिण के राज्य के कुलीन जमींदार वर्ग दासप्रथा व रंगभेद नीति के कट्टर समर्थक रहे हैं। उन्होंने अश्वेतों पर भीषण अत्याचार ढाने के लिए आतंकवादी दल क्लू-क्लक्स-क्लान का गठन किया था। पुराने किस्म की बंदूक में गोली चलाते समय/घोड़ा दबाते समय क्लू-क्लक्स-क्लान की ध्वनि सुनाई देती है। पिछले 200 वर्षों से क्लू-क्लक्स-क्लान अफ्रीकी अमरीकीयों पर हर तरीके से जुल्म ढाते आ रहा है। जिसमें अश्वेतों को दौड़ा-दौड़ा कर, समूह में पीट-पीट कर या धारदार हथियार से घांेप घोंप कर मारने (माॅब लिचिंग) जैसे जघन्य अपराध शामिल हंै। पिछले 6 वर्षो से हमारे देश में संघीय काॅर्पोरेट फासिस्टों के राज में मुलसमानों व दलितों के खात्मे के लिए माॅब लिचिंग का तरीका संघ परिवार ने अपने मार्गदर्शक अमेरीका से ही सीखा है।
    जैसे-जैसे अमरीका में पूंजीवादी साम्राज्यवादी नीतियां परवान चढ़ती रही वैसे-वैसे अश्वेतों के खिलाफ नफरत, भेदभाव व हिंसक घटनाएं बढ़ती रही। क्लू-क्लक्स-क्लान की नस्लभेदी सोच अमरीकी प्रशासन एवं पंूजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था के अंदर तक घर कर गई है। नस्ल भेद/रंग भेद के खिलाफ आंदोलन के दौरान बसों में अश्वेतों पर लगी पाबंदियों के खिलाफ रोजा पाक्र्स और 60-70 के दशक में अश्वेतों के लिए समानाधिकार के पक्ष में न्याय के लिए लड़ने वाले मार्टिन लूथर किंग जूनियर, मेलकम एक्स, एंजेलो डेविस और ब्लैक पैंथर आंदोलन (जिनके प्रभाव से भारत में दलितों का दलित पैंथर आंदोलन उभरा) मील के पत्थर माने जाते हैं। इन प्रतिवादियों की पहल से अश्वेतों को कई अधिकार मिले उनके दुःख को आक्रोश में बदलने की आवाज मिली।
    इसी अफ्रीकन अमेरिकन समुदाय ने अपने श्रम उत्पादन मेहनत से अमेरिका को बसाया, विकसित अमेरिका बनाया। अमेरिका ने साबित कर दिया कि कोरोना से खतरनाक है नस्लवाद और पंूजीवाद। असल में पूंजीवाद ही नस्लवाद व सांप्रदायिकता को बढ़ावा दे रहा है। हमारे भारत में भी क्रांतिकारी जनवादी तबकों ने 4 जून को नस्लीय हिंसा, न्याय के पक्ष में व असमानता के खिलाफ अमरीकी जनता के साथ एकजूटता प्रदर्शित किया। लेकिन विडंबना यह है कि देवताओं की भूमि कहे जाने वाले भारत में हर रोज जाॅर्ज फ्लायड जैसे दलित, गुजरात के उना से लेकर उ.प्र. के जौनपुर तक हिंसक जाति व्यवस्था की श्रेष्ठता के नाम पर प्रताड़ित किये जाते हैं व मार डाले जाते हैं। भारत में जाॅर्ज फ्लायड को मूंछ रखने पर, घोड़ी पर चढ़ने पर, बुलेट मोटरसाइकल खरीदने पर, उंचा मकान बनाने पर, उच्च शिक्षा हासिल करने पर, अच्छे कपड़े पहनने पर, अंतरजातीय विवाह करने पर, डांडिया नाच देखने के नाम पर, गौ रक्षा के नाम पर, मंदिर को अपवित्र करने में नाम पर ब्राम्हणवाद/मनुवाद अपने पैरों से उनकी गर्दन दबाकर हत्या कर देता है।
    जाॅर्ज फ्लाॅयड के लिए न्याय का आंदोलन जो ‘‘काले भी इंसान हैं उनका जीवन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है’’ कि भावना से ओतप्रोत अमरीकी जनता में इस अभूतपूर्व विक्षोभ जो कि आॅक्यूपाई वाल स्ट्रीट व न्याय व शांति के लिए मार्टिन लूथर किंग के एतिहासिक मार्च से भी अधिक ताकतवर है ने अमरीका में कुछ भी पहले जैसा नहीं रहने दिया है। अमरीकी संघीय प्रशासन व राज्यों के प्रशासन, पुलिस प्रणाली में सुधार करने के बारे में गहराई से सोच रहे है। न्यूयार्क पुलिस विभाग ने अपने नस्लीय पूर्वाग्रहों के लिए बदनाम अपराध विरोधी इकाई को भंग करने का निर्णय लिया है। न्यूयार्क पुलिस विभाग ने अपने पुलिस बजट में कटौती करने की घोषणा की है। अश्वेत फिल्म निर्माता-निर्देशक व लेखकों ने मनोरंजन उद्योग में व्याप्त नस्लीय पूर्वाग्रह को दूर करने का प्रस्ताव रखा है। भूतपूर्व हैवीवेट बाॅक्सिंग चैंपियन मोहम्मद अली (कैशियस क्ले) से लेकर प्रथम अश्वेत विम्बलडन चैंपियन आर्थर ऐश से बास्केटबाॅल किंवदंती रह चुके माईकल जाॅर्डन तक रंगभेद की यंत्रणा झेल चुके क्रीड़ा उद्योग से भी यही मांग उठी है।
    अमरीका के मीडिया घरानों के न्यूज रूम में पसरे नस्लभेद व भेदभाव पर भी गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। न्यूजर्सी के एटाॅर्नी जनरल गुरबीर गे्रवाल ने सभी कानून व्यवस्था का पालन करने वाली एजेंसियों को निर्देशित किया है कि वे गंभीर अनुशासनहीनता और जनता का दमन करने वाले पुलिस अधिकारियों की सूची बनाएं। अमरीका जैसे एक पंूजीवादी जनवादी समाज व भारत जैसे एक नवउपनिदेशिक दासता वाले समाज की चेतना में कितना फर्क है।
    अमरीका से शुरू हुआ जन विद्रोह जो ‘हमारी गर्दन से हाथ हटाओ, ‘नस्लवाद ही अमरीका का असल पाप है’ नारों को बुलंद कर रहा है, पूरे विश्व में पंूजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा कर रहा है। जैसा कि कुछ विचारकों ने बताने का प्रयास किया है कि यह अश्वेतों का अश्वेतों के लिए आंदोलन है, लेकिन इसे गलत साबित कर कोरोना के सर्वदेशीय महामारी के प्रकोप के दरम्यान अमरीका की मेेहनतकश वा उत्पीड़ित जनता ने बर्बर अमरीकी पंूजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था के खिलाफ जंग का आगाज किया है एक बेहतर समतावादी नए अमरीकी समाज के लिए। क्या अमरीका में क्रांति होगी और देश समाजवाद की ओर आगे बढ़ेगा ? माक्र्सवाद-लेनिनवाद यही सिखाता है कि एक मजबूत क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी के बिना जनविक्षोभ को क्रांति में बदलना असंभव है। मिस्र समेत मध्यपूर्व के कई देशों में शासन व्यवस्था विरोधी वसंत विद्रोह के बावजूद साम्राज्यवाद ने वहां शासकों को बदलकर विद्रोह को ठंडा कर दिया। लेकिन आज की तारीख में यह बात तो हमारे मन में क्रांतिकारी आशावाद का जन्म देती ही है कि दुनिया की जनता का दुश्मन नंबर एक साम्राज्यवादी ताकतों का सरगना अमरीकी में जब जनता अन्याय-अत्याचार के खिलाफ उठकर निजाम को हिला सकती है तो अमरीकी साम्राज्यवाद के जूनियर पार्टनर घोर सांप्रदायिक नस्लवादी भगवा फासिस्ट राज को उखाड़ फेंकने के लिए यहां भी जनता का सैलाब एक दिन जरूर सड़कों पर उमड़ पड़ेगा।

सभी चित्र- सरिता पांडेय से साभार

Wednesday, 24 June 2020

भारत चीन सीमा विवाद: मिथक और यथार्थ- मनीष आज़ाद


अंधकार के इस दौर में ठगी और धोखधड़ी का प्रचार हमारे जीवन के प्रत्येक पहलू को प्रभावित कर रहा है। राजनीतिक यथार्थ का निजीकरण हो चुका है। भ्रम को वैधानिकता प्रदान कर दी गयी है। सूचना का युग वस्तुतः मीडिया का युग है। यहां मीडिया द्वारा राजनीति की जाती है, मीडिया द्वारा सेन्सरसिप लागू की जाती है और मीडिया द्वारा ही युद्ध चलाया जाता है। - जॉन पिल्जर

15 जून को गलवान घाटी में चीनी सैनिकों से झड़प के बाद 20 भारतीय सैनिकों की निर्मम मौत हो गयी और 10 को चीन ने बंधक बना लिया (हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया)। पूरा देश सन्नाटे में आ गया। ऐसे कठिन समय में जब सरकार को आगे आना चाहिए था और स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए थी, तो सरकार ने अपना काम सुपर देशभक्तटी वी चैनलों को आउटसोर्स कर दिया। और जैसा कि उम्मीद थी इन चैनलों पर एक हिस्टीरिया सा छा गया। अचानक उनका वाल्यूम ऊंचा से ऊंचा होता गया। टीवी चैनल के एंग्री यंग मैनअरनव गोस्वामी ने चाइना गेट आउटका पूरा अभियान ही छेड़ दिया। लेकिन इस हिस्टीरिया में किसे याद था कि चाइना गेट आउटनामक टीवी प्रोग्राम को चीन की ही दो बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां वीवोऔर शियोमीप्रायोजित कर रही हैं।

जी टीवीभी कहां पीछे रहने वाला था। उसने अपने प्रोग्राम को नाम दिया-छेड़ोगे तो छोड़ेंगे नहीं।पता नहीं मोदी ने इनसे जुमलेबाजी सीखी है या इन्होंने मोदी से। बहरहाल जब जी टीवीके सुधीर चौधरी चीन का डीएनए टेस्ट कर रहे थे तो जी टीवीचीन में वहां की मंडरीन भाषा में चीनियों को सास बहू के सीरियल दिखा कर उनका मनोरंजन कर रहा था। जी टीवीपहला भारतीय टीवी चैनल है जिसे 2012 में चीन में अपना प्रोग्राम दिखाने का अधिकार मिला। जी टीवीने चीन में अपने लैडिंग राइट्सहासिल करने के लिए बहुत पापड़ बेले हैं।


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ा स्वदेशी जागरण मंचजब चीन के सामान के बायकाट का नारा दे रहा है और सड़कों पर चीनी सामानों की होली जलाने के दृश्य सभी मीडिया चैनल ज़ोर-शोर से दिखा रहे हैं तो उसी समय आरबीआई की सहमति से दिल्ली में बैंक ऑफ चाइनाकी शाखा खुल रही है। ठीक इसी तरह जब 2017 में भारत चीन के बीच डोकलाम संकटआया था तो ठीक डोकलाम संकट के बाद चीन के इण्डस्ट्रियल एण्ड कमर्शियल बैंकको भारत में काम करने की अनुमति प्रदान की गयी थी। आपको याद होगा कि उस समय देश में चीन विरोधी लहर आज से ज़्यादा तेज़ थी और जी न्यूज उस समय समान नहीं सम्मानतथा हिन्दी-चीनी बाय बायका अभियान छेड़े हुए था। उसी समय मोदी के चहेते पूंजीपति अदानी ने डोकलाम के तुरन्त बाद ही पावर चाइनाके साथ एक बड़ा समझौता किया था। यहां तक कि अपने मुन्द्रा पावर प्रोजेक्ट के लिए चाइना डेवलपमेन्ट बैंक से भारी कर्ज़ भी लिया था। और तो छोड़िये मोदी के गृह प्रदेश गुजरात ने चीन के साथ 1 अक्टूबर 2019 को एक बिजनेस डील पर हस्ताक्षर किया। जिसके तहत गुजरात में चाइना इण्डस्ट्रियल पार्कबनना है जहां विशेषकर चीनी कम्पनियां अपना निवेश करेंगी। 15 अगस्त 20017 को लांच हुए जिओ फोन की पहली खेप चीन से आयी थी। आज हालत यह है की भारत की लगभग सभी बड़ी कंपनियां चीन में अपना उत्पादन कर रही है


यानी पाखण्ड हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है। इसका डीएनए टेस्ट कौन करेगा।

बहरहाल काफी दबाव पड़ने के बाद अंततः 4 दिन बाद प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक में बयान दिया कि कुछ भी नहीं हुआ है। चीनी सेना एक इंच भी भारत की जमीन में प्रवेश नहीं की है। मज़ेदार बात यह है कि ठीक यही बयान चीन की तरफ से भी आया कि कुछ भी नहीं हुआ है और चीनी सेना ने भारतीय क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया है। यहीं पर रूककर पुलवामा और बालाकोट याद कीजिए। घर में घुसकर मारने वाली वीरता कहां चली गई। यहां तो इस बात से ही इंकार कर दिया गया कि कोई घर में घुसा भी है। आज चीन मोदी से बहुत खुश है क्योंकि 15 जून की झड़प में चीन ने पूर्वी लद्दाख और उत्तरी सिक्किम में लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोलको अपने फ़ायदे में बदल दिया है, और यह बात अब किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर नहीं उठेगी। मोदी अपने ही बनाये सुपर मैनके इमेज में खुद फंस गया। याद कीजिए जेपी नड्डा का बयान कि मोदी देश के ही नहीं भगवानों के भी नेता है। और कोई भगवान हार कैसे सकता है। गलवान घाटी अभी तक कभी भी विवादास्पद क्षेत्र नहीं रहा है। और आज गलवान घाटी की पहाड़ियों पर चीन का कब्जा हो चुका है। वहां पहाड़ की ऊंचाइयों से वह अब भारत की तरफ 224 किमी लंबी डीबीओ (Darbuk-Shyok-Daulet Beg Oldie) सड़क पर रणनीतिक निगरानी रख सकता है, जिसका इस्तेमाल भारतीय सेना करती है। यह भारत की बड़ी रणनीतिक हार है। भारत के पास वो क्षमता तो नहीं है कि वो सैन्य कार्यवाही के माध्यम से चीन को इस क्षेत्र से खदेड़ सके, लेकिन कूटनीतिक तौर पर वह चीन द्वारा किये गये इस अतिक्रमण को अन्तरराष्ट्रीय मंच पर उठा सकती है और चीन पर निर्णायक दबाव बना सकती है। लेकिन ऐसा करने से मोदी की सुपरमैन भगवानवाली छवि का क्या होगा। मोदी की इस छवि की कीमत आज पूरा देश चुका रहा है। 5 मई से 15 जून के बीच चीन लगभग 3 से 5 किमी तक लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोलको भारत की तरफ खिसका चुका है। रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण गोलवान की पहाड़ियों पर कब्जा जमा लिया है और वहां स्थाई सैन्य बेस बना लिया है। तमाम सैटेलाइट इमेज, और प्रवीन साहनी, अजय शुक्ला, एच एस पनाग, शेखर गुप्ता जैसे सुरक्षा विशेषज्ञ इसकी पुष्टि कर चुके हैं और सरकार से जवाब मांग रहे हैं। डबल आई डबल एस [www.iiss.org] जैसी अन्तरराष्ट्रीय सैन्य शोध सस्थाएं भी इसी तथ्य को बयां कर रही हैं। और इधर सिर्फ मोदी की सुपरमैन छवि को बचाने के लिए सरकार और सुपर देशभक्त मीडियाने इस जलते तथ्य को पूरी तरह पचा लिया है, और जो लोग इस तथ्य को रखते हुए सरकार से जवाब मांग रहे हैं उन्हें देशद्रोही घोषित किया जा रहा है।


ठीक इसी खतरे को देखते हुए लेफ्टिनेन्ट जनरल के पद से रिटायर हुए एच एस पनागने 18 जून को इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने लेख में साफ किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा को घरेलू राजनीति से अलग किया जाना चाहिए। लेकिन यहां तो मामला और भी आगे बढ़ चुका है। पिछले 6 सालों में भाजपा ने भारत की विदेश नीति को घरेलू राजनीति का विस्तार बना दिया है। और घरेलू राजनीति को साम्प्रदायिक राजनीति में संकुचित कर दिया है। इसी कारण से हमारी विदेश नीति पाकिस्तान नीति बनके रह गयी है। इस राजनीति के कारण आज भारत इस स्थिति में भी नहीं है कि वह किसी अन्तरराष्ट्रीय मंच पर यह मुद्दा उठा सके कि चीन ने भारतीय सीमा का अतिक्रमण किया है।

चैनलों में और सड़कों पर मोदी भक्त यह कहते नहीं थक रहे कि आज का भारत 1962 का भारत नहीं हैं। लेकिन इससे बड़ा सच यह है कि आज का चीन 1962 का चीन नहीं है। 1962 के युद्ध में भारत की हार के बाद पूरी दुनिया को आश्चर्य में डालते हुए चीन एकतरफा युद्धविराम करके पीछे लौट गया था, क्योंकि वह माओ का समाजवादी चीन था। सन्त विनोबा भावे ने इसे इतिहास की एक अनूठी घटना करार दिया। लेकिन आज का चीन साम्राज्यवादी चीन है जो पूरी दुनिया में ज़मीन और खनिज सम्पदा पर कब्जे के लिए कुछ भी करने को तैयार बैठा है।

दरअसल भारत की अन्य तमाम समस्याओं की तरह सीमा विवाद भी साम्राज्यवादी अग्रेजों की देन है। 1950 के बाद भारत के पास चीन के साथ सीमा विवाद सुलझाने का एक सुनहरा अवसर था। लेकिन नेहरू की ज़िद थी कि अंग्रेजों द्वारा 1914 में बनायी गयी 'मैकमोहन रेखा' को ही चीन और भारत के बीच सीमा रेखा मान लिया जाय। इसके अलावा अक्साई चीन पर भी नेहरू ने अपना दावा ठोक दिया। जबकि खुद नेहरू ने ही संसद में बयान दिया था कि अक्साई चीन में घास का एक तिनका भी नहीं उगता। चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाउ एन लाई ने नेहरू के साथ कई राउण्ड की बातचीत में नेहरू को यही समझाने का प्रयास करते रहे कि हम दोनों देश ही अंग्रेजी साम्राज्यवाद के शिकार रहे हैं। तो हम क्यों उनकी बनायी रेखा को मान्यता दें। हमें मिल बैठकर इस मसले को हल करना चाहिए। लेकिन नेहरू इसी पर अड़े थे कि मैकमोहन रेखा को ही चीन मान्यता दे। 1960 में चीन का सोवियत रूस के साथ सम्बन्ध काफ़ी खराब हो चुका था और चीन-रूस सीमा पर भी कई झड़पें हो चुकी थी। अमरीका ने तो उस वक्त तक चीन को मान्यता ही नहीं दी थी। अन्ततः रूस और अमरीका के उकसावे पर भारत ने चीन पर आक्रमण कर दिया। नतीजा सबके सामने है।

लेकिन भारत ने उसके बाद भी कोई सबक नहीं लिया। आज भी वह एशिया में अमरीकी रणनीतिक योजना का हिस्सा बनने में ही अपनी सफलता मान रहा है और चीन के साथ अपने रिश्ते को अमरीकी नज़र से ही देख रहा है। चीन के साथ भारत के तनावपूर्ण रिश्तों का एक बड़ा कारण भारत का अमरीका की गोदी में बैठना है।

1971 में बांग्लादेश युद्ध के हीरो माने जाने वाले जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने 1998 में दिये अपने एक साक्षात्कार में भारत चीन युद्ध के बारे में ये निचोड़ दिया -'अगर नेहरू समझदार होते तो चीन से युद्ध नहीं होता। दरअसल बात यह है कि हमारी चीन के साथ जो मैकमोहन सीमा रेखा है वह कोई सर्वमान्य सीमा नहीं है। अंग्रेजों की तय की हुई सीमा है। अंग्रेजों द्वारा नक्शे में खींची गयी रेखा की सीमा है।..............हमारी तैयारी नहीं थी कि हम उन पर आक्रमण कर दे। लेकिन सेना को आदेश दिया गया कि हम चीन पर आक्रमण कर दें। सरकार ने यह सब समझने के बाद ऐसा निर्णय लिया और हम असफल हुए। एक तरह से हमने यह लड़ाई जानबूझ कर मोल ली।

सैन्य व सुरक्षा मामलों की पत्रिका फोर्सके सम्पादक प्रवीन साहनी और ग़ज़ाला बहाव की लिखी एक किताब ड्रैगन एट योर डोर स्टेप[2017] ने भारत के सुरक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी। दोनो ने तमाम तर्को और तथ्यों से यह निष्कर्ष पेश किया कि भारत जहां सैन्य 'फोर्स' को बढ़ा रहा है वहीं चीन और पाकिस्तान सैन्य 'पावर' को बढ़ा रहे हैं। फोर्सऔर पावरका अन्तर बहुत बारीकी से समझाया गया है। भारत जहां अपना पूरा ध्यान सीमापार आतंकवाद पर लगा रहा है वहीं चीन अपने युद्ध प्रयासों को बहुआयामी बना रहा है। अन्त में प्रवीन साहनी और ग़ज़ाला बहाव का सनसनीखेज निष्कर्ष यह है कि पूर्ण युद्ध में भारत चीन को तो नहीं ही हरा सकता, वह पाकिस्तान को भी हराने में अब सक्षम नहीं है।

लेकिन इन सबकी चिन्ता किसे है। जब तक टीवी चैनलों की फौज और आईटी सेल के गोला बारूद मोदी के साथ है, और सच को झूठ और झूठ को सच बनाने की इण्डस्ट्री बदस्तूर जारी है उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इसलिए किसी ने सच कहा था कि जब झूठ और धोखाधड़ी का साम्राज्य हो तो सच बोलना एक क्रान्तिकारी कार्य है। आज भारत में इस क्रान्तिकारी कार्य की सख्त जरूरत है। राजा को नंगा बोलने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा बच्चोंकी ज़रूरत है।