Saturday, 18 September 2021

दिखने लगा चुनावी फायदा, यूपी में सामने आया अल कायदा-सिद्धार्थ कलहंस

 

यह कोई संयोग नहीं था कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की छवि पर धक्का लगने के बाद इसी साल जून में भारतीय जनता पार्टी में डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरु होने के बाद ताबड़तोड़ तरीके से प्रदेश में अल कायदा, धर्मांतरण और जनसंख्या नियंत्रण कानून से लेकर कई स्थानों पर माब लिंचिग की घटनाएं एक साथ होने लगीं।

सबसे पहले बात उत्तर प्रदेश में पकड़े गए अल कायदा आतंकवादियों की, जिन्हें कथित तौर पर बड़ी घटना को अंजाम देने से पहले गिरफ्तार कर यूपी के आंतक रोधी बल (एटीएस) ने साजिश को नाकाम कर देने का दावा किया। पुलिस का दावा कि गिरफ्तार आतंकियों के तार अल-कायदा से जुड़े एक संगठन अंसार गजवातुल हिन्द से जुड़े थे और इनका हैंडलर पाकिस्तान के पेशावर में मौजूद था। गिरफ्तारी और उसके बाद बरामदगी साजिशकर्त्ताओं से पूछताछ का तानाबाना कुछ इस कदर बुना गया कि प्रवर्तन निदेशालय, एनआईए से लेकर तमाम केंद्रीय जांच एजेंसिया इसमें शामिल हो गयीं। अब तो पूरे मामले को एनआईए के हाथों में दे दिया गया है और उसने अपनी जांच शुरु कर दी है।

बीते महीने 11 जुलाई को यूपी पुलिस और एटीएस के संयुक्त आपरेशन में राजधानी लखनऊ में दुबग्गा क्षेत्र से मिनहाज अहमद और मोहिबुल्लापुर से मसरुद्दीन को गिरफ्तार कर अल कायदा के एक बड़े नेटवर्क के भंडाफोड़ का दावा किया गया। इन आतंकवादियों के घर से प्रेशर कुकर की बरामदगी दिखा कर दावा किया गया कि इससे बम बनाकर यूपी को दहलाने का इरादा था। हथियारों के नाम पर मिनहाज के घर से एक देशी पिस्तौल, कुछ चाकू तो मसरुद्दीन के घर से माचिस की कई डिब्बियां बरामद की गयीं।

इनके साथ ही अलग-अलग जगहों पर राजधानी में ही अन्य गिरफ्तारियां भी की गयीं और इन सबको अल कायदा नेटवर्क से ही जुड़ा बताया गया। स्थानीय पुलिस ने 50 वर्षीय मोहम्मद मुस्तकीम को भी मड़ियांव थाने बुलाकर गिरफ्तार किया गया जबकि 13 जुलाई को न्यू हैदरगंज निवासी 29 साल के मोहम्मद मुईद और जनता नगरी के रहने वाले 27 साल के शकील को भी गिरफ्तार किया गया।


अल कायदा जैसे दुनिया के सबसे बड़े आतंकी संगठन में काम करने वाले इन आरोपियों के बारे में भी जानना बहुत जरुरी है।

इनमें से एक मिनहाज की खदरा में बैटरी की दुकान थी जबकि मसीरूद्दीन व शकील बैटरी रिक्शा चलाते थे। गिरफ्तार किए गए मोहम्मद मुईद जमीन की खरीद बिक्री का काम करते थे और मोहम्मद मुस्तकीम ठेके पर मजदूर रख छोटे घर बनवाते थे। इनमें से मिनहाज को छोड़ दें तो मसीरूद्दीन, शकील, मोहम्मद मुईद व मोहम्मद मुस्तकीम निम्न मध्यम वर्ग परिवारों से हैं। मसीरूद्दीन व शकील तो रोज कमाने खाने वाले लोग थे जिन्होंने अपने बैटरी रिक्शा के लिए बैटरी मिनहाज से ली थी। मोहम्मद मुस्तकीम तो ऐसे फंस गया कि जब आतंकवाद निरोधक दस्ता मसीरूद्दीन को पकड़ने गया तो वह वहां मसीरूद्दीन के घर से सटे उसके भाई का घर बनवा रहा था। पहले सिर्फ उसका मोबाइल फोन व पहचान पत्र लिया गया किंतु बाद में थाने बुलाकर उसे गिरफ्तार भी कर लिया गया।

मिनहाज जरुर एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी का बेटा है जिसका पत्नी एक निजी विश्वविद्यालय में पढ़ाने का काम करती है। खुद मिनहाज भी पहले इसी विश्वविद्यालय में लैब असिस्टेंट के पद पर काम कर चुका है। अस्थाई नौकरी होने के चलते बीते कुछ साल पहले अपनी बैटरी की दुकान खोल दी थी। आंतकवादी होने के आरोप में पकड़े गए दो अन्य शकील और मसरुद्दीन बैटरी रिक्शा चलाते हैं और बैटरी चार्ज करवाने या बदलने के चलते मिनहाज के संपर्क में आए थे। इन दोनों के घरवालों का कहना है कि पांच-पांच रुपये की सवारियां ढोने वाले अल कायदा के लिए क्या काम करते होंगे। अधबने टीन की छत वाले मकान में रहने वाला मसरुद्दीन के परिजनों का कहना है कि प्रेशर कुकर तो हाल ही में नया खरीद कर लाया गया था जो बच्चियों को देने के लिए था। उसकी तीनों बच्चियां स्कूल में पढ़ती हैं। शकील के घर वजीरगंज का दौरा करने पर पड़ोसियों ने बताया कि कोरोना के दौर में रिक्शा चलाकर भी घर का पेट भरने में दिक्कतों का सामना कर रहे इस व्यक्ति का आतंकवादी कहा जाना हैरत में डालता है। शकील की गुरबत और उस पर टूट पड़ी आफत से आहत मोहल्ले वालों ने तो मामले को कवर करने गए पत्रकारों पर ही गुस्सा निकाला और उन्हें भगा दिया।

इन गिरफ्तारियों के बाद पुलिस की ओर से जो बयान जारी किए गए और बरामदगी में जो कुछ भी दिखाया गया उसके बाद आतंकवाद पर लिखने, शोध करने वालों और इसकी जानकारी रखने वालों ने सवाल खड़े करने शुरु कर दिए। पूरे मामले में सबसे अहम चीज प्रेशर कुकर की बरामदगी है जिससे बम बनाकर स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रदेश को दहलाने की साजिश बताया जाता है। बरामद हथियारों में सबसे बड़ा एक देशी पिस्तौल है जिसे मिनहाज के घर से पाया गया बताया है। माचिस की खाली डिब्बियों के संदर्भ में एटीएस के लोगों का कहना है कि इसका इस्तेमाल बम बनाने में किया जाता है। बरामद चाकूओं में से कुछ तो इतने दयनीय दशा में थे कि उनके बारे में बताना भी मुनासिब नही समझा गया।

बरसों से अपराध बीट पर काम करने वाले और आतंकवाद की रिपोर्टिंग में महरात रखने वाले पत्रकार दीपक शर्मा का कहना है कि अपने संगठन के बारे में इन बातों को पढ़ सुन कर अल कायद के अलंबरदार शायद आत्महत्या कर लेंगे। उनका कहना है कि सबसे अत्याधुनिक हथियारों, तकनीक और रणनीति का इस्तेमाल कर दुनिया में बड़ी घटनाओं को अंजाम देने वाला अल कायदा अब प्रेशर कुकर, देशी तमंचे और पिस्तौल पर उतर आया है ये अपने आप में हास्यास्पद है। उन्होंने कहा कि कम से कम यूपी की पुलिस को अब तो अपना स्क्रिप्ट राइटर बदल देना चाहिए और कम से कम कुछ बेहतर किस्सागोई करने वालों की भर्ती करनी चाहिए। शर्मा का कहना है कि इस तरह की हरकतों से न केवल अभियोजन पक्ष अदालत में कमजोर होगा, बल्कि जगहंसाई भी हो सकती है।

वहीं यूपी पुलिस के एक पूर्व अधिकारी बताते हैं कि प्रेशर कुकर बम का इस्तेमाल पहले-पहल तब सुना गया था, जब बंगलादेश से चलने वाले हूजीनाम के संगठन के कुछ आतंकवादी प्रदेश में पकड़े गए थे। उनके मुताबिक 2007  में हूजीआतंकी बाबू भाई की गिरफ्तारी के बाद प्रेशर कुकर बम की बात सामने आयी थी। अल कायदा और जैश जैसे संगठन इन तरीकों का कभी इस्तेमाल करते हैं- ये न कभी देखा या सुना गया। उनका भी कहना है कि हो सकता है कि अल कायदा के स्लीपिंग माड्यूल देश में और उत्तर प्रदेश में मौजूद हों पर कम से कम इस तरीके से चलाया गया कोई आपरेशन व बरामदगी को तो केवल हमारी पुलिस को हंसी का पात्र ही बनाएगी। उक्त अधिकारी का कहना है कि अल कायदा की कहानी में कितना दम है ये तो विवेचना पूरी हो जाने के बाद ही पता चलेगा पर अगर ये कहानी सही साबित होती है तो इस बड़े आतंकी संगठन की नयी और अनूठी रणनीति का पता सबको चलेगा।

आतंकी नेटवर्क के खुलासे के ठीक पहले ही यूपी की पुलिस ने धर्मांतरण में शामिल एक गिरोह को पकड़ने का दावा भी किया और ताबड़तोड़ गिरफ्तारी भी की हैं। धर्मांतरण गिरोह के तार देश के ज्यादातर राज्यों से जुड़े होने का दावा भी किया गया है। मामले का मुख्य आरोपी मौलाना जहांगीर कासमी और उमर गौतम को बताया गया है जिससे जुड़े लोगों की महाराष्ट्र में भी गिरफ्तारी की गयी है। धर्मांतरण के मामले में आईएसआई और विदेशी फंडिग का भी दावा किया गया है जिसकी जांच की जा रही है।

कुछ इसी समय उत्तर प्रदेश में जनसंख्या नियंत्रण कानून की भी कवायद शुरु की गयी है। कानून का ड्राफ्ट मुख्यमंत्री को सौंपा जा चुका है और इसी के साथ इसे लेकर बयानबाजी का दौर भी शुरु हो गया है। हालांकि जनसंख्या नियंत्रण कानून के प्रावधानों पर सत्ताधारी भाजपा से जुड़े संगठन विश्व हिन्दू परिषद ने ही आपत्ति जता दी है। प्रदेश की लगातार घटती प्रजनन दर का हवाला देते हुए परिषद ने कानून के मसौदे पर ही सवाल उठा दिए हैं।

राजनैतिक जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से पहले वो सभी मुद्दे उठाए जा रहे हैं जो ध्रुवीकरण में सहायक हो सकते हैं। अनायास ही नहीं है कि साढ़े चार साल तक सरकार चलाने के बाद एकायक यूपी में एक साथ धर्मांतरण, अलकायदा से लेकर तमाम चीजें एक साथ निकल कर आने लगी हैं। गाजियाबाद से लेकर कानपुर तक माब लिचिंग की घटनाएं भी इन्हीं दिनों बढ़ने लगी है। प्रदेश के कुछ शहरों में एक बार फिर से अल्पसंख्यक बहुल मोहल्लों में मकान बिकाउ हैंके पोस्टर भी नजर आने लगे हैं। सवाल जरुर उठता है कि चार सालों तक रामराज चलने के बाद अचानक से इन घटनाओं का उभार कैसे होने लगा है। यह भी माना जा रहा है कि भाजपा के खुद के आंतरिक सर्वे में कोरोना संकट के बाद हालात बहुत पतली दिखाई दी है और इसे लेकर डैमेज कंट्रोल की कवायद तेज की गयी है। संगठन की ओर से सरकार में बदलावों पर भी विचार किया गया पर आखिरकार सुई ध्रुवीकरण पर ही आकर अटकी है जिसे जीत का सबसे मुफीद फार्मूला माना गया है।

लेखक पत्रकार हैं

दस्तक नए समय की अंक सितम्बर अक्टूबर २०२१ में प्रकाशित लेख

मनुवादी प्रदेश: उत्तर प्रदेश- आकांक्षा आज़ाद


उत्तर प्रदेश में
2022 विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सियासी गहमागहमी तेज हो गई है। हर पार्टी अपना पासा फेंक कर जनता को जीत लेने की कोशिश में है। सभी पार्टियों ने अपनी चुनावी रणनीति तय कर ली है।  दूसरे लॉकडाउन में अपने ऊपर लगे दागों को साफ करने में जुटी भाजपा की योगी सरकार सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया के माध्यम से प्रोपेगेंडा शुरू कर चुकी है। फिर से पूरे देश को नफरत की आग में डुबोने के लिए कई हथकंडे (जैसे जनसंख्या नियंत्रण कानून) के माध्यम से योगी सरकार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की तैयारी में है। एक तरफ वे अपनी सरकार की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रही वही दूसरी उत्तर प्रदेश की में महिलाओं और जाति आधारित उत्पीड़न चरम पर है।

इसको समझने के लिए सबसे पहले दो खबरों पर नजर डालते हैं। 23 जून 2021 को इंडियन एक्सप्रेस-ए अड्डा के इंटरव्यू में यूपी के मुख्यमंत्री अजय सिंह बिष्ट उर्फ़ योगी आदित्यनाथ ने अपना सीना चौड़ा करते हुए कहा कि हमारी सरकार ने उत्तर प्रदेश के प्रत्येक नागरिक के मन में सुरक्षा का बोध जागृत किया है.उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था नजीर के रूप में दी जाती है।इसी कानून व्यवस्था की तारीफ अगस्त महीने में गृह मंत्री अमित शाह ने अपने दौरे के दौरान की। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था देश में नंबर 1 है। अब दूसरी खबरों पर नजर डालते हैं। यह खबरें 1 महीने के अंदर घटी घटनाओं की है।

1) उत्तर प्रदेश के देवरिया में जींस पहनने पर 17 वर्षीय नाबालिग लड़की की उसके रिश्तेदारों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी।

 2) गोरखपुर में ब्राह्मण लड़की से शादी करने पर दलित लड़के को भरे बाजार में काट कर मार डाला।

 3) सहारनपुर में ठाकुरों ने दलित युवक की मूँछे मुड़वाई और कहा मूँछे रखना सिर्फ ठाकुरों का काम है।

4) ब्लॉक प्रमुख चुनाव में महिला उम्मीदवार को भाजपा गुंडों द्वारा निर्वस्त्र करने की कोशिश गयी।

5) कानपुर देहात में 20 वर्षीय दलित युवक की सरेआम कर हत्या कर दी गयी। जाति पूछ कर मारते हुए वीडियो वायरल हुआ।

6) बिजनौर में उच्च जाति के खेत में घुसने के कारण दो दलित महिलाओं से उच्च जाति के लोगों ने मारपीट की।

 7) अलीगढ़ में गेहूं चोरी के आरोप में 22 वर्षीय दलित युवक की सरेआम पीट कर हत्या।

8) फिरोजाबाद में 18 वर्षीय दलित लड़के को उच्च जाति के व्यक्ति ने पीटा। शराब पीकर तेज रफ्तार से ट्रैक्टर चलाने पर आपत्ति जताई थी।

9) पुलिस कस्टडी में दलित पुरुष की पीट-पीटकर हत्या। परिवार ने पुलिस पर लगाये गम्भीर आरोप। 

10) कानपुर में बजरंग दल के लोगों ने एक मुस्लिम आदमी को घसीटकर पीटा, जबकि उसकी बेटी रोते हुए पिता के पैरों से लिपटी रही।

इनमें में कई खबरें सतह तक आ पाई और कई अंदर ही दबा दी गयी। अब इन दोनों पक्षों को तौलिए एक तरफ माननीय मुख्यमंत्री का दम्भ भरते हुए सीना चौड़ा करना और दूसरी तरफ महिला और दलित और मुस्लिम उत्पीड़न में बेतहाशा वृद्धि। क्या इसी नम्बर 1 कानून व्यवस्था जिक्र मुख्यमंत्री जी कर रहे थे जिसमें दलितों- मुसलमानों और महिलाओं का उत्पीड़न बदस्तूर जारी है। कानून व्यवस्था की जगह मनु व्यवस्था शायद ज्यादा सटीक हो। एक तरफ पूरे प्रदेश में जातीय दम्भ चरम पर है, महिला उत्पीड़न की रोज नई-नई घटनाएं सामने आ रही हैं और वहीं मुख्यमंत्री जनता को वोट बैंक के लिए भरमा रहे हैं। जिस राज्य के मुख्यमंत्री पर ही कई संगीन आरोप हो तो उस राज्य की कानून और न्याय व्यवस्था का आकलन करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। आगामी 2022 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए योगी सरकार मीडिया मैनेजमेंट पर काफी जोर दे रही। ब्लॉक प्रमुख के चुनावों के दौरान आई जातीय और महिला उत्पीड़न कई घटनाएं हुई जिन्हें खबर के रूप में उठाना भी मीडिया को जरूरी नहीं लगा या यूँ जानबूझकर दबा दी गई। उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत में रोजाना इस तरह की सैकड़ों अपराध होते हैं लेकिन वह कभी सामने नहीं आ पाते।

भारतीय राज्य घोर सामंती और खुले रूप में महिला विरोधी है जिसकी नींव जाति व्यवस्था है। इस जाति व्यवस्था के बारे में बाबा साहब अंबेडकर करते थे यह एक बहुमंजिला इमारत है जिसमें कोई भी सीढ़ी या खिड़की नहीं है। इसका मतलब जिस व्यक्ति ने जिस जाति में जन्म लिया है, जीवनपर्यन्त उसी जाति में बने रहेंगे। यह जाति व्यवस्था जातियों के ऊंच-नीच पर आधारित है। कुछ जातियों को अछूत और निम्न माना गया है। जाति व्यवस्था को बनाये रखने के लिए हिंसा का एक हथियार के रूप में इस्तेमाल होता रहा है।  जाति उत्पीड़न की घटनाएं इसी का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और इसी सामंती-जातिवादी भारतीय राज्य के प्रतिनिधि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री आवास में गृह प्रवेश के पहले गोमूत्र और गंगाजल से पूरे आवास का शुद्धिकरण कराते हैं। आपको मालूम हो कि इससे पहले मुख्यमंत्री आवास में एक दलित महिला और पिछड़ा वर्ग के मुख्यमंत्री निवास कर चुके है। शुद्धिकरण से साफ समझा जा सकता है कि जब स्वयं मुख्यमंत्री की मानसिकता घोर जातिवादी हो तो पूरे प्रदेश की क्या स्थिति होगी। भारतीय समाज में जाति व्यवस्था ही व्यक्तियों का खानपान, रहन-सहन, पेशा, समाज में आपकी हैसियत तय करती है। 


जातियों का आपसी मेलजोल कैसा होगा यह खुद जाति व्यवस्था तय करती है। जिसके अनुसार एक जाति का विवाह दूसरी जाति में नहीं हो सकता। खास तौर पर अगर महिला उच्च जाति से हो और पुरुष निम्न जाति से। गोरखपुर लंबे समय से मुख्यमंत्री का गढ़ रहा है, उसी गोरखपुर में भरे चौराहे पर एक दलित युवक की काट कर हत्या कर दी जाती है। उस दलित युवक का गुनाह सिर्फ इतना था कि उसने जाति व्यवस्था के नियम को ताक पर रखते हुए एक ब्राह्मण युवती से शादी कर ली थी। जाति व्यवस्था इस तरीके से लोगों में झूठा घमंड भरती है, कि परिवारों को अपनी बेटी का अपने पसन्द से शादी करना भी गुनाह लगता है। बेटी की जान से ज्यादा प्यारी उनकी अपनी जातीय घमण्ड के साथ-साथ मर्दवादी सोच हो जाती है। लड़की अपने पसन्द से शादी करले वह भी एक निम्न मानी जाने वाली जाति के लड़के के साथ, तो उन्हें इसकी सजा देकर अपनी इज्ज़तबचाना ज़्यादा जरूरी लगता है। इन हत्याओं पर अगर गौर करें, तो हम पाते हैं कि ज्यादातर ऑनर किलिंग जैसे अपराधों में लड़के-लड़कियों को सार्वजनिक जगहों पर मारा जाता है ताकि अपने जाति के अंदर और घर के पुरुषों के इच्छा अनुसार शादी करने के परंपरा को कोई चुनौती न दे सके। इस तरह की हत्याओं के पीछे नौजवानों में डर फैलाना एक मूल वजह होती है। पूरे भारत में इस तरह की हजारों खबरें मौजूद हैं, कोई यह सोचता है कि वह आर्थिक रूप से संपन्न होकर इस जाति व्यवस्था से अपने आप को आजाद कर सकता है तो यह गोरखपुर की घटना उनके लिए एक सबक है। अपने मर्जी से प्रेम विवाह करने वाला गोरखपुर का यह दंपत्ति दोनों ही पंचायत सचिव के रूप में कार्यरत थे। यह घटना बताती है कि आर्थिक संपन्नता भी जाति व्यवस्था को नहीं तोड़ सकती है और आखिरकार लड़के की सरेआम काट कर हत्या कर दी गई। इस बात को एक और घटना से जोड़कर समझा जा सकता है। भारतीय हॉकी खिलाड़ी वंदना कटारिया का हॉकी खेल में हार जाना कुछ लोगों के लिए सिर्फ इसलिए सुखद था, कि वह एक दलित पृष्ठभूमि से आती है। देश को ओलम्पिक खेलों में मान सम्मान दिलाने के बावजूद वन्दना कटारिया को सिर्फ उनकी जाति के लिए अपमानित किया गया। गौरतलब है कि भारतीय हॉकी टीम के हारने के बाद वंदना के घर के बाहर जातिवादी अपशब्द कहते हुए पटाखे फोड़कर जश्न मनाया गया। अगर किसी मुसलमान ने यह काम भारतीय टीम के हारने पर किया होता, तो उसपर तो निश्चित ही देशद्रोह और यूएपीए जैसे कानून थोप दिये जाते।

इसके बाद अगर हम देखें तो देवरिया में 17 वर्षीय नाबालिग लड़की को उनके चाचा-चाची, दादा-दादी ने सिर्फ इसलिए मार-मार कर हत्या कर दी कि उसने सोमवारी का व्रत रखने के बाद पूजा के दौरान भारतीय पारंपरिक कपड़े न पहनकर जींस पहन लिया था। और इससे बड़ी बात यह थी कि उनके टोकने पर लड़की ने अपने रिश्तेदारों से बहस-बाजी कर ली थी। लड़कियों का बोलना इस महिला विरोधी सामंती समाज को सबसे ज्यादा चुभता है। फलस्वरूप नाबालिग की हत्या करके उसके अपने ही दादा-दादी और चाचा-चाची ने नजदीकी पुल पर टांग दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सब मामलों में मीडिया न इन खबरों को जल्दी दिखाती है इन महिलाओं या इन दलितों के पक्ष में खड़ा होती है।


जाति व्यवस्था में दलितों को निम्न पायदान दिया गया है जिनका काम उच्च जातियों की सेवा करना है। फलतः दलितों को मानवीय गरिमा के अधिकार से भी बेदखल कर दिया गया। पूरे भारत में दलितों के साथ अत्याचारों को देखकर यह प्रतीत होता है, जैसे उनकी जान की कोई कीमत नहीं है। कहीं गेहूं चोरी करने के आरोप में तो कहीं उच्च जाति के खेतों में घुसने के कारण दलितों को अपमानित किया जाता है, उनकी मूंछे मुड़वा दी जाती हैं और पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है और यह सब उन्हें उनकी औकात बताने के लिए की जाती है। उत्तर प्रदेश के आंकड़े देखें तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2015 से 2019 के दौरान महिला के विरुद्ध अपराध में 66.7 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। 2019 में पूरे भारत में रजिस्टर्ड महिला के विरुद्ध अपराध में उत्तर प्रदेश का प्रतिशत 15 है। मतलब देश भर के कुल अपराधों में 15 प्रतिशत अपराध उत्तरप्रदेश में हुए हैं। 2019 में दलित महिलाओं के उत्पीड़न में उत्तर प्रदेश का दूसरा स्थान है मतलब जब तक आप या लेख पढ़कर खत्म करेंगे तब तक किसी महिला के साथ इस तरह के बर्बर अपराध हो चुके होंगे। हमारी समस्या है कि अपराधों को बस हम आँकड़ो तक सीमित करके देखते हैं। इस सभी घटनाओं के कारणों, उसके पीछे के सोच का विश्लेषण करना और मामले की संवेदशीलता को समझना ज्यादा जरुरी है। इन अपराधों को न्यू नार्मलबना दिया गया है। और हम खुद इसे बहुत सहजता से लेने लगते हैं।

ऊपर दिए गए आंकड़े अपराधों के विस्तार का एक छोटा पहलू है। हम-आप स्वयं इस तरह के कई अपराधों के शिकार होते और परिस्थितिवश चुप हो जाते हैं। आखिर क्या कारण है कि जितने अपराध रोज़ होते हैं उसका एक छोटा हिस्सा ही दर्ज होता है। पड़ताल करने पर एक प्रमुख वजह है पुलिस-प्रशासन का स्वंय जातिवादी और महिला विरोधी होना। जिन अपराधों का जिक्र लेख के शुरुआत में किया गया है उन सभी को अगर हम उठाकर देखें तो पुलिस प्रशासन का चरित्र जातिवादी और महिला विरोधी निकल कर सामने आता है। जिन संस्थाओं से उम्मीद की जाती है कि अपराधों की निष्पक्ष जांच हो, लेकिन जब इस संस्थाओं में ब्राह्मणवादी सोच का ही बोलबाला हो तो न्याय मिलना लगभग असंभव सा ही हो जाता है। सितम्बर 2020 में हाथरस की गैंगरेप पीड़िता के मामले में पूरा सत्ता पक्ष बेनकाब हो जाता है। जिस तरह पुलिस ने पूरे मामले में ढिलाई बरती और मामले को रफा-दफा करने के लिए पीड़िता के शव को चुपके से आधी रात को जला दिया, यह सब करना सरकार के समर्थन और शह के बिना असम्भव है। लोगों के उठे रोष को दबाने के लिए पूरे गांव की बैरिकेटिंग करके पीड़ित परिवार को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। फ़र्ज़ी आरोपों पर पत्रकारों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। केरल के पत्रकार सिद्दकी कप्पन अभी भी बेगुनाह होकर भी जेल में कैद कर दिए गए है। कुलदीप सेंगर जिनको बलात्कार के अपराध में सजा सुनाई गई है उनको को जिस तरह से योगी सरकार ने संरक्षण दिया और पीड़िता के परिवार को खत्म करने की पूरी साज़िश रची गई हम सभी अनभिज्ञ नही है। जब स्वंय पुलिस अधिकारीगण का सामाजीकरण इस दलित-महिला विरोधी माहौल में हुआ हो तो वह भी दलित और महिला को नीच-जाहिल अछूत-अनपढ़ ही समझेंगे। और खासकर तब जब सिस्टम को बनाये रखना तो उनके दायित्वों में से एक हो। जब मशीन ही जातिवादी हो तो उसका फल तो यही होना निश्चित है। जाति व्यवस्था पूरे समाज का अमानवीकरण करती है। जब तक ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और पूरे समाज को दीमक की तरह चाटने वाली जाति व्यवस्था मौजूद रहेगी तब तक ऐसे अपराध होते रहेंगे।

2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर चाहे योगी सरकार अपने ऊपर लगे दागों को छुपाने के लिए जितनी भी मेहनत कर ले, सच्चाई को छुपाने की जितनी भी कोशिश कर ले अब जनता को तय करना है कि उत्तर प्रदेश का भविष्य क्या होना है।

लेखिका बीएचयू की छात्रा और भगतसिंह छात्र मोर्चा की अध्यक्ष हैं।

 दस्तक नए समय की अंक सितम्बर अक्टूबर २०२१ में प्रकाशित लेख

 

 


Saturday, 1 May 2021

घरेलू श्रम की कीमत और रोजगार का सवाल -वन्दना भगत

देश अभी दो अंतर्विरोधी घटनाओं से गुजर रहा है। एक तरफ कोरोना की महामारी से हो रही मौते तो दूसरी तरफ चुनाव प्रचार में हो रही बड़ी-बड़ी रैलियां और रोड शो। अभी इन रैलियों का सिलसिला बंगाल में चल रहा फर बंगाल से होते हुए दक्षिण भारत के राज्यों में जल्द ही पहुँचेगा। चुनाव में रोड शो, रैलियों को तो हम सब कई सालों से देखते-सुनते आ रहे है। मगर इस बार के विधानसभा के चुनाव में तमिलनाडु और केरल की पार्टियों ने चुनाव से पहले जारी किए घोषणापत्र में कुछ ऐसा लिखा है जिसे सुन कर पहले पल में तो खुशी हुई पर दूसरे ही पल कुछ सवाल मन मे उमड़-घुमड़ करने लगते है।

तमिलनाडु की ज्यादातर बड़ी चुनावी पार्टियों और केरल की सीपीआई एम ने घरेलू महिलाओं को पेंशन देने का वादा किया है। तमिलनाडु में लगभग सभी पार्टियां इस एजेंडे को उठा रही हैं, बस पेंशन की रकम में कम ज्यादा का अंतर है। केरल में जब सत्तासीन सीपीआई(एम) जो वर्तमान में स्क्थ् गठबंधन का नेतृत्व कर रही, के राज्य सचिव ए. विजयराघवन ने केरल की घरेलू महिलाओं के लिए सिक्योरिटी पेंशन की घोषणा 19 मार्च को अपने चुनाव मेनिफेस्टो जारी करने के दिन किया। केरल से कांग्रेस पार्टी के सांसद शशि थरूर ने भी इसका समर्थन किया। 

अगर कल को ये पार्टियां चुनाव में जीत कर अपने इस वादे को याद रखती है और लागू करती है तो इस कदम का स्वागत होना चाहिए और इन पार्टियों को सराहना भी की जानी चाहिए। पर चुनाव से पहले वादे तो वादे ही होते है और हमारा देश 74 साल से ऐसे कई छोटे-बड़े वादों से गुजरता हुआ आज कहाँ खड़ा है हम सब जानते है।

महिलाओं पर घरेलू कामों के बोझ को बहुत लंबे समय से अनदेखा किया गया है। महिलाओं द्वारा किये जाने वाले घर के इन कामों को कामकी तरह लिया भी नही जाता। इन्हें बेहद मामूली या फिर बिना थकान के मिनटों में होने वाला काम समझा जाता रहा है। इस मुद्दे को महिला आंदोलन और  प्रगतिशील आंदोलनों में ही जगह मिली है। पर जितनी बात और जितना संघर्ष होना चाहिए था वो आज तक नही हुआ है। फिर यह सवाल उठना तो लाजमी है कि अचानक चुनावी पार्टियों के एजेंडे में घरेलू महिला को पेंशन देने का विचार आया कहाँ से? क्या इसका कारण घरेलू महिलाओं का वोट है? या फिर इस एजेंडे के पीछे कोई और मकसद है?

घरेलू महिला के श्रम को अचानक मिले महत्व को समझने के लिए हमंे क्रम से कुछ घटनाओं को देखना होगा। साल 2020 के दिसम्बर महीने में तमिलनाडु के एक्टर व पॉलिटिशियन कमल हसन ने घरेलू काम-काज में लगी महिलाओं के श्रम और उसके महत्व पर एक टिप्पणी की। उसके बाद इसी साल जनवरी महीने में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों के बेंच ने एक केस के जजमेंट के दौरान घरेलू कामांे में लगी महिला के श्रम के मूल्य को ऑफिस जाने वाले पुरुष के बराबर बताया। इस बेंच का नेतृत्व जस्टिस एन. वी. रमन कर रहे थे। साल 2014 में मोटर साइकिल सवार पति-पत्नी का देहांत सड़क दुर्घटना में हो गया। इन्श्योरेन्स के पैसे के मामले में यह केस हाईकोर्ट पहुँचा। हाईकोर्ट ने इन्श्योरेन्स कंपनी को 11.2 लाख का मुवावजा पीड़ित परिवार को देने का जजमेंट फैसला सुनाया। मुआवजा व्यक्ति की आय के मद्देनजर तय किया गया। इस मामले में पति की मासिक वेतन तो तय थी पर पत्नी को कितने का मुआवजा दिया जाय ये कैसे तय होता, क्योंकि हमारे समाज में तो घरेलू महिला बिना वेतन ही सारा काम करती है। हाई कोर्ट ने अपने अंदाजे से 11 लाख का कुल मुआवजा पीड़ित परिवार को देने का आदेश इन्श्योरेंस कंपनी को दिया। पीड़ितों के परिवार वाले इस केस को सुप्रीम कोर्ट ले जाते हैं, जिसका जजमेंट 5 जनवरी 2021 को आता है। जस्टिस रमन का यह जजमेंट सराहनीय है और इस पर ज्यादा से ज्यादा चर्चा की जरूरत है ताकि यह विषय आम जनमानस तक पहुँचे। इस जजमेंट में जस्टिस रमन कहते है, 2011 के जनगणना के मुताबिक 57.9 लाख पुरुषांे के मुकाबले 15.98 करोड़ महिलाएं घरेलू कामों को मुख्य काम की तरह करती हैं। हाल ही में आये सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि घर में रोजाना किये जाने वाले बिना वेतन के कामों में एक महिला का औसतन 299 मिनट देती है जिसमंे खाना बनाना, साफ-सफाई, सब्जी समान लाना आदि जैसे कई छोटे-बड़े काम शामिल है, वही औसतन एक पुरुष 97 मिनट देता है। इसके अलावा, घर और घर के सदस्यों की देखभाल में औसतन एक महिला 134 मिनट प्रतिदिन देती है, तो वही पुरुष 76 मिनट देते है। यानि इन सरकारी आंकड़ों की भी माने तो हर घरेलू महिला 24 घंटे में 7-8 घंटे बिना वेतन वाले घर के कामांे और घर के सदस्यों जैसे बच्चे और बुजुर्गों आदि की देखभाल में देती है। वास्तवित स्थिति इन आंकड़ों से काफी ज्यादा बुरी है और घरेलू कामों के बोझ तले ये महिलाएं इससे कई गुना ज्यादा दबी हुई है। गांव में रहने वाली घरेलू महिला की बात करें तो वे न सिर्फ घर के कामों से लाद दी जाती हैं, बल्कि खेती और जानवरों के देखभाल जैसे भी कई काम उन्ही के माथे मढ़ दिया जाता है। गांव में आज भी रोपाई, सोहाई, कटाई जैसे काम ज्यादातर महिलाओं के जिम्मे ही होता है। ऐसे में गांव की महिलाओं पर घरेलू और बाहर के काम का बोझ कितना हो जाता होगा वह हम सोच सकते है।

जस्टिस रमन की बेंच कहती है कि महिलाओं के इतने सारे कामों के बाद भी अगर समाज में यह धारणा रहती है कि घरेलू महिला काम नही करती या वह आर्थिक रूप से घर मे कोई में कोई सहयोग नही करती, तो हमे इस गलत धारणा को तोड़ने की जरूरत है। आगे वे कहते है कि कोर्ट को घरेलू महिलाओं की संख्या को ध्यान में रखते हुए उनके कामों के लिए राष्ट्रीय आय तय करनी चाहिए और साथ ही उनके श्रम, सेवा और त्याग को अहमियत देनी चाहिए। घरेलू महिला के काम न सिर्फ घर के आर्थिक स्थिति में योगदान देती है बल्कि राष्ट्र के अर्थव्यवस्था में भी उनके योगदान को मान्यता देने की जरूरत है, जो कि अब तक राष्ट्र के आर्थिक विश्लेषण से बाहर रहा है। जस्टिस रमन आगे जोड़ते हैं, कि यह कदम संविधान के अनुसार हर शख्स को सामाजिक बराबरी और गरिमा हासिल कराने के विज़न की तरफ होगा। इन्ही शब्दों के साथ जस्टिस रमन्ना और उनके बेंच के अन्य दो जजो के सर्वसहमति से 2014 के सड़क दुर्घटना के पीड़ितों के परिवार को मुवावजे की रकम बढ़ कर 33 लाख देने का आदेश इन्श्योरेन्स कंपनी को देती है।

इस जजमेंट से यह बात तो सामने आ गयी के घरेलू महिला का काम भी कामहै और वह राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में योगदान देता है जिसको शायद जमीनी स्तर के चर्चा में आने में थोड़ा और समय लग जाय। सुप्रीम कोर्ट ने तो न्याय-अन्याय के तराजू में देखते हुए यह सारी बातें एक मुआवजा तय करने के लिए कही,  पर सवाल अभी वहीं है कि चुनावी पार्टियों का घरेलू महिला को पेंशन देने के विचार के पीछे क्या मकसद हो सकता है!

इसे समझने के लिए हमे अपने संदर्भ को और बढ़ाना पड़ेगा। पिछले साल लॉकडाउन के दौरान जब पूरा देश घरों में कैद होने को विवश था तब जा कर बहुत से लोगों ने खास कर पुरुषों ने घरों में होने वाले अनगिनत कामों को करीब से देखा और थोड़ा बहुत उन कामांे में भाग भी लेना पड़ा। ज्यादातर परिवारों के पुरुषों के लिए ये बहुत अलग और उबाऊ अनुभव था जब उन्हें महिलाओं की तरह 24 घंटे घर मे कैद रहना पड़ा। इस दौरान घर के कामांे को छोटा और आसान समझने वाले बहुत से लोगों का भरम टूटा। ऑनलाइन शिक्षा के कारण बच्चों की पढ़ाई और देखभाल का जिम्मा भी पहले के मुकाबले ज्यादा बढ़ गया। इस लॉकडाउन में महिलाओं का दिन भर में अपने लिए बचाया समय जब वो टीवी देखने या कुछ अपने मन की चीजें करने में बिताती थी उसे भी पूरी तरह खो दिया। मेहनतकश जनता जिसमें महिलाएं भी शामिल है, जो दिहाड़ी पर जीते थे उनका हाल तो बद से बदतर हो गया। इस वर्ग में भूख से कितने ही जाने गयी होंगी, इसका आंकड़ा शायद ही कभी सामने आए मगर यह कहा जा सकता है कि वे आंकड़े उतने ही दिल दहला देने वाले होंगे, जितना कि सड़कों पर सैकड़ों हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर गांव लौट रहे उन लोगों को देखना था। लॉकडाउन के दौरान और उसके बाद तक करोड़ो लोगो ने अपनी नौकरियों से हाथ धो दिया। अर्थव्यवस्था की कमर टूट कर कितनी चकनाचूर हुई यह बताने वाला हमारे देश मे कोई मीडिया तो था नही और साथ ही देश के प्रधानमंत्री देश की तरक्की के गुण गाते थक नही रहे थे पर -2.3 पहुँची जीडीपी और महंगाई बढ़ते दामांे ने अर्थव्यवस्था की चरमराई हालात का पर्दाफाश कर दिया। नौकरी न मिलने के कारण रोज कितने ही नौजवानों ने आत्महत्या के लिए विवश हुए और इन आत्महत्याआंे का सिलसिला अभी भी जारी है। सही मायने में ये शासक वर्ग द्वारा की गई हत्याएं है। CMIE के आंकड़ों के मुताबिक लॉकडाउन और उसके बाद नौकरियों में महिला कर्मचारियों की सहभागिता 71 प्रतिशत पुरूषांे के मुकाबले मात्र 11 प्रतिशत रह गयी है। यानि घर से बाहर काम करने वाली महिलाओं की जो थोड़ी बहुत सहभागिता आनी शुरू हुई थी, लॉकडाउन में हुई छंटनी का निशाना बना उन्हें फिर से घर तक सीमित कर दिया गया। इस गिरावट पर न तो सरकार ध्यान दे रही और न ही यह मुद्दा किसी चुनावी पार्टी के घोषणापत्र में जगह बना पा रही। ऐसी स्थिति में चुनावी पार्टियों का बिना रोजगार घरेलू काम-काज में लगी महिलाओं को पेंशन देने का वादे से एक साजिश की बू आती है। इस आर्थिक मंदी के दौर में जब हर तरफ एक ही मांग उठ रही वह है रोजगार। ऐसे में सत्ता वर्ग देश की आधी आबादी महिलाओं को इस मांग से काटना तो नहीं चाहती है? पेंशन और नौकरी में पुरुष के बराबर के वेतन में बहुत बड़ा अंतर होता है। नौकरी हासिल करने की दौड़ में आज महिलाएं भी समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे से लड़ती हुई उत्पादन में हिस्सेदारी कर रही हैं। यह संख्या घरेलू काम मंे लगी महिलाओं से काफी कम है फिर भी मंदी के नाम पर छंटनी के लिए एक महिला होना काफी है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो कर वह अपने फैसले खुद लेने और समाज की कई रूढ़ियों को तोड़ रही है। एक सामंती और पितृसत्तात्मक देश में महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी अपने आप मंे एक प्रगतिशील बदलाव है। घर के कामों में लगी महिलाओं के श्रम को मुद्दा बनाने का स्वागत है, इसकी जरूरत भी है, ताकि यह अवधारणा टूटे के घर के काम छोटे काम है और इन्हें सिर्फ महिलाओं के हिस्से में देखा जाना चाहिए। चुनावी पार्टियां जो कल को खुद सत्ताधारी भी हो सकती है, का घरेलू महिला को पेंशन देने का वादा और रोजगार से जुड़े ये आंकड़े एक मांग पर परदा डालने की साजिश की ओर भी इशारा कर रही हैं। इससे यही मूल्यांकन बन रहा कि ये पार्टियां महिलाओं के श्रम को महिमामंडित कर उन्हें घर के कामों तक ही सीमित कर देना चाहती है ताकि ये हिस्सा रोजगार की मांग से बेदखल कर दिया जाय। यह अंदेशा कोई अविश्वसनीय अंदेशा नही है। फासीवाद के दौर में जब देश लगातार मंदी के दौर से गुजर रहा होता है, तब जनता को कान खड़े रखने की और शासक वर्ग के हर वादे, हर कानून और हर भाषण को चौकन्ना हो कर समझना और सवाल करने की जरूरत है। देश हितके नाम पर जब शासक वर्ग लगातार ब्।। caa कृषि कानून, लेबर लॉ, नई शिक्षा नीति जैसे जनविरोधी ऐलानों का अपना भोपू बजा ही रही है।

सवाल ये है कि अगर घरेलू श्रम का पेंशन मिलता भी है, तो यह ऐसा बंधुआ श्रम ही होगा, जिसे बंधुवा बनाये रखने का यह एक सरकारी उपाय ही होगा। क्योंकि बहुत सी औरतें इन घरेलू कामों को नहीं करना चाहती है, ये पेंशन उन्हें इन कामों की ओर और जोर से ढकेलने वाली साबित हो सकती हैं, क्योंकि तब घर के लोग इस तर्क से महिला से अधिक काम लेंगे कि इसका उसे पैसा मिल रहा है। यह बंधुवागिरी महिलाओं को और गुलामी की ओर ले जायेगा, रोजगार से तो वे पहले ही वंचित हैं, न सिर्फ रोजगार की कमी से, बल्कि घर के सामंती संरचना की वजह से। औरतों को घरेलू कामों से मुक्त करना उनकी मुक्ति का रास्ता खोलेेगा और इसके लिए पेंशन नहीं घरेलू कामों का सामूहिकीकरण और सामाजिकरण ही एकमात्र रास्ता है। क्या कोई चुनावी पार्टी इसके लिए है तैयार?

लेखिका आईआईटी कानपुर में शोधार्थी हैं और एसएफसी नाम के संगठन से जुड़ी हैं

दस्तक नए समय की [मई जून २०२१ अंक] में प्रकाशित लेख