Saturday, 18 September 2021

मनुवादी प्रदेश: उत्तर प्रदेश- आकांक्षा आज़ाद


उत्तर प्रदेश में
2022 विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सियासी गहमागहमी तेज हो गई है। हर पार्टी अपना पासा फेंक कर जनता को जीत लेने की कोशिश में है। सभी पार्टियों ने अपनी चुनावी रणनीति तय कर ली है।  दूसरे लॉकडाउन में अपने ऊपर लगे दागों को साफ करने में जुटी भाजपा की योगी सरकार सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया के माध्यम से प्रोपेगेंडा शुरू कर चुकी है। फिर से पूरे देश को नफरत की आग में डुबोने के लिए कई हथकंडे (जैसे जनसंख्या नियंत्रण कानून) के माध्यम से योगी सरकार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की तैयारी में है। एक तरफ वे अपनी सरकार की तारीफों के पुल बांधते नहीं थक रही वही दूसरी उत्तर प्रदेश की में महिलाओं और जाति आधारित उत्पीड़न चरम पर है।

इसको समझने के लिए सबसे पहले दो खबरों पर नजर डालते हैं। 23 जून 2021 को इंडियन एक्सप्रेस-ए अड्डा के इंटरव्यू में यूपी के मुख्यमंत्री अजय सिंह बिष्ट उर्फ़ योगी आदित्यनाथ ने अपना सीना चौड़ा करते हुए कहा कि हमारी सरकार ने उत्तर प्रदेश के प्रत्येक नागरिक के मन में सुरक्षा का बोध जागृत किया है.उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था नजीर के रूप में दी जाती है।इसी कानून व्यवस्था की तारीफ अगस्त महीने में गृह मंत्री अमित शाह ने अपने दौरे के दौरान की। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था देश में नंबर 1 है। अब दूसरी खबरों पर नजर डालते हैं। यह खबरें 1 महीने के अंदर घटी घटनाओं की है।

1) उत्तर प्रदेश के देवरिया में जींस पहनने पर 17 वर्षीय नाबालिग लड़की की उसके रिश्तेदारों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी।

 2) गोरखपुर में ब्राह्मण लड़की से शादी करने पर दलित लड़के को भरे बाजार में काट कर मार डाला।

 3) सहारनपुर में ठाकुरों ने दलित युवक की मूँछे मुड़वाई और कहा मूँछे रखना सिर्फ ठाकुरों का काम है।

4) ब्लॉक प्रमुख चुनाव में महिला उम्मीदवार को भाजपा गुंडों द्वारा निर्वस्त्र करने की कोशिश गयी।

5) कानपुर देहात में 20 वर्षीय दलित युवक की सरेआम कर हत्या कर दी गयी। जाति पूछ कर मारते हुए वीडियो वायरल हुआ।

6) बिजनौर में उच्च जाति के खेत में घुसने के कारण दो दलित महिलाओं से उच्च जाति के लोगों ने मारपीट की।

 7) अलीगढ़ में गेहूं चोरी के आरोप में 22 वर्षीय दलित युवक की सरेआम पीट कर हत्या।

8) फिरोजाबाद में 18 वर्षीय दलित लड़के को उच्च जाति के व्यक्ति ने पीटा। शराब पीकर तेज रफ्तार से ट्रैक्टर चलाने पर आपत्ति जताई थी।

9) पुलिस कस्टडी में दलित पुरुष की पीट-पीटकर हत्या। परिवार ने पुलिस पर लगाये गम्भीर आरोप। 

10) कानपुर में बजरंग दल के लोगों ने एक मुस्लिम आदमी को घसीटकर पीटा, जबकि उसकी बेटी रोते हुए पिता के पैरों से लिपटी रही।

इनमें में कई खबरें सतह तक आ पाई और कई अंदर ही दबा दी गयी। अब इन दोनों पक्षों को तौलिए एक तरफ माननीय मुख्यमंत्री का दम्भ भरते हुए सीना चौड़ा करना और दूसरी तरफ महिला और दलित और मुस्लिम उत्पीड़न में बेतहाशा वृद्धि। क्या इसी नम्बर 1 कानून व्यवस्था जिक्र मुख्यमंत्री जी कर रहे थे जिसमें दलितों- मुसलमानों और महिलाओं का उत्पीड़न बदस्तूर जारी है। कानून व्यवस्था की जगह मनु व्यवस्था शायद ज्यादा सटीक हो। एक तरफ पूरे प्रदेश में जातीय दम्भ चरम पर है, महिला उत्पीड़न की रोज नई-नई घटनाएं सामने आ रही हैं और वहीं मुख्यमंत्री जनता को वोट बैंक के लिए भरमा रहे हैं। जिस राज्य के मुख्यमंत्री पर ही कई संगीन आरोप हो तो उस राज्य की कानून और न्याय व्यवस्था का आकलन करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। आगामी 2022 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए योगी सरकार मीडिया मैनेजमेंट पर काफी जोर दे रही। ब्लॉक प्रमुख के चुनावों के दौरान आई जातीय और महिला उत्पीड़न कई घटनाएं हुई जिन्हें खबर के रूप में उठाना भी मीडिया को जरूरी नहीं लगा या यूँ जानबूझकर दबा दी गई। उत्तर प्रदेश समेत पूरे भारत में रोजाना इस तरह की सैकड़ों अपराध होते हैं लेकिन वह कभी सामने नहीं आ पाते।

भारतीय राज्य घोर सामंती और खुले रूप में महिला विरोधी है जिसकी नींव जाति व्यवस्था है। इस जाति व्यवस्था के बारे में बाबा साहब अंबेडकर करते थे यह एक बहुमंजिला इमारत है जिसमें कोई भी सीढ़ी या खिड़की नहीं है। इसका मतलब जिस व्यक्ति ने जिस जाति में जन्म लिया है, जीवनपर्यन्त उसी जाति में बने रहेंगे। यह जाति व्यवस्था जातियों के ऊंच-नीच पर आधारित है। कुछ जातियों को अछूत और निम्न माना गया है। जाति व्यवस्था को बनाये रखने के लिए हिंसा का एक हथियार के रूप में इस्तेमाल होता रहा है।  जाति उत्पीड़न की घटनाएं इसी का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और इसी सामंती-जातिवादी भारतीय राज्य के प्रतिनिधि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री आवास में गृह प्रवेश के पहले गोमूत्र और गंगाजल से पूरे आवास का शुद्धिकरण कराते हैं। आपको मालूम हो कि इससे पहले मुख्यमंत्री आवास में एक दलित महिला और पिछड़ा वर्ग के मुख्यमंत्री निवास कर चुके है। शुद्धिकरण से साफ समझा जा सकता है कि जब स्वयं मुख्यमंत्री की मानसिकता घोर जातिवादी हो तो पूरे प्रदेश की क्या स्थिति होगी। भारतीय समाज में जाति व्यवस्था ही व्यक्तियों का खानपान, रहन-सहन, पेशा, समाज में आपकी हैसियत तय करती है। 


जातियों का आपसी मेलजोल कैसा होगा यह खुद जाति व्यवस्था तय करती है। जिसके अनुसार एक जाति का विवाह दूसरी जाति में नहीं हो सकता। खास तौर पर अगर महिला उच्च जाति से हो और पुरुष निम्न जाति से। गोरखपुर लंबे समय से मुख्यमंत्री का गढ़ रहा है, उसी गोरखपुर में भरे चौराहे पर एक दलित युवक की काट कर हत्या कर दी जाती है। उस दलित युवक का गुनाह सिर्फ इतना था कि उसने जाति व्यवस्था के नियम को ताक पर रखते हुए एक ब्राह्मण युवती से शादी कर ली थी। जाति व्यवस्था इस तरीके से लोगों में झूठा घमंड भरती है, कि परिवारों को अपनी बेटी का अपने पसन्द से शादी करना भी गुनाह लगता है। बेटी की जान से ज्यादा प्यारी उनकी अपनी जातीय घमण्ड के साथ-साथ मर्दवादी सोच हो जाती है। लड़की अपने पसन्द से शादी करले वह भी एक निम्न मानी जाने वाली जाति के लड़के के साथ, तो उन्हें इसकी सजा देकर अपनी इज्ज़तबचाना ज़्यादा जरूरी लगता है। इन हत्याओं पर अगर गौर करें, तो हम पाते हैं कि ज्यादातर ऑनर किलिंग जैसे अपराधों में लड़के-लड़कियों को सार्वजनिक जगहों पर मारा जाता है ताकि अपने जाति के अंदर और घर के पुरुषों के इच्छा अनुसार शादी करने के परंपरा को कोई चुनौती न दे सके। इस तरह की हत्याओं के पीछे नौजवानों में डर फैलाना एक मूल वजह होती है। पूरे भारत में इस तरह की हजारों खबरें मौजूद हैं, कोई यह सोचता है कि वह आर्थिक रूप से संपन्न होकर इस जाति व्यवस्था से अपने आप को आजाद कर सकता है तो यह गोरखपुर की घटना उनके लिए एक सबक है। अपने मर्जी से प्रेम विवाह करने वाला गोरखपुर का यह दंपत्ति दोनों ही पंचायत सचिव के रूप में कार्यरत थे। यह घटना बताती है कि आर्थिक संपन्नता भी जाति व्यवस्था को नहीं तोड़ सकती है और आखिरकार लड़के की सरेआम काट कर हत्या कर दी गई। इस बात को एक और घटना से जोड़कर समझा जा सकता है। भारतीय हॉकी खिलाड़ी वंदना कटारिया का हॉकी खेल में हार जाना कुछ लोगों के लिए सिर्फ इसलिए सुखद था, कि वह एक दलित पृष्ठभूमि से आती है। देश को ओलम्पिक खेलों में मान सम्मान दिलाने के बावजूद वन्दना कटारिया को सिर्फ उनकी जाति के लिए अपमानित किया गया। गौरतलब है कि भारतीय हॉकी टीम के हारने के बाद वंदना के घर के बाहर जातिवादी अपशब्द कहते हुए पटाखे फोड़कर जश्न मनाया गया। अगर किसी मुसलमान ने यह काम भारतीय टीम के हारने पर किया होता, तो उसपर तो निश्चित ही देशद्रोह और यूएपीए जैसे कानून थोप दिये जाते।

इसके बाद अगर हम देखें तो देवरिया में 17 वर्षीय नाबालिग लड़की को उनके चाचा-चाची, दादा-दादी ने सिर्फ इसलिए मार-मार कर हत्या कर दी कि उसने सोमवारी का व्रत रखने के बाद पूजा के दौरान भारतीय पारंपरिक कपड़े न पहनकर जींस पहन लिया था। और इससे बड़ी बात यह थी कि उनके टोकने पर लड़की ने अपने रिश्तेदारों से बहस-बाजी कर ली थी। लड़कियों का बोलना इस महिला विरोधी सामंती समाज को सबसे ज्यादा चुभता है। फलस्वरूप नाबालिग की हत्या करके उसके अपने ही दादा-दादी और चाचा-चाची ने नजदीकी पुल पर टांग दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन सब मामलों में मीडिया न इन खबरों को जल्दी दिखाती है इन महिलाओं या इन दलितों के पक्ष में खड़ा होती है।


जाति व्यवस्था में दलितों को निम्न पायदान दिया गया है जिनका काम उच्च जातियों की सेवा करना है। फलतः दलितों को मानवीय गरिमा के अधिकार से भी बेदखल कर दिया गया। पूरे भारत में दलितों के साथ अत्याचारों को देखकर यह प्रतीत होता है, जैसे उनकी जान की कोई कीमत नहीं है। कहीं गेहूं चोरी करने के आरोप में तो कहीं उच्च जाति के खेतों में घुसने के कारण दलितों को अपमानित किया जाता है, उनकी मूंछे मुड़वा दी जाती हैं और पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है और यह सब उन्हें उनकी औकात बताने के लिए की जाती है। उत्तर प्रदेश के आंकड़े देखें तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2015 से 2019 के दौरान महिला के विरुद्ध अपराध में 66.7 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। 2019 में पूरे भारत में रजिस्टर्ड महिला के विरुद्ध अपराध में उत्तर प्रदेश का प्रतिशत 15 है। मतलब देश भर के कुल अपराधों में 15 प्रतिशत अपराध उत्तरप्रदेश में हुए हैं। 2019 में दलित महिलाओं के उत्पीड़न में उत्तर प्रदेश का दूसरा स्थान है मतलब जब तक आप या लेख पढ़कर खत्म करेंगे तब तक किसी महिला के साथ इस तरह के बर्बर अपराध हो चुके होंगे। हमारी समस्या है कि अपराधों को बस हम आँकड़ो तक सीमित करके देखते हैं। इस सभी घटनाओं के कारणों, उसके पीछे के सोच का विश्लेषण करना और मामले की संवेदशीलता को समझना ज्यादा जरुरी है। इन अपराधों को न्यू नार्मलबना दिया गया है। और हम खुद इसे बहुत सहजता से लेने लगते हैं।

ऊपर दिए गए आंकड़े अपराधों के विस्तार का एक छोटा पहलू है। हम-आप स्वयं इस तरह के कई अपराधों के शिकार होते और परिस्थितिवश चुप हो जाते हैं। आखिर क्या कारण है कि जितने अपराध रोज़ होते हैं उसका एक छोटा हिस्सा ही दर्ज होता है। पड़ताल करने पर एक प्रमुख वजह है पुलिस-प्रशासन का स्वंय जातिवादी और महिला विरोधी होना। जिन अपराधों का जिक्र लेख के शुरुआत में किया गया है उन सभी को अगर हम उठाकर देखें तो पुलिस प्रशासन का चरित्र जातिवादी और महिला विरोधी निकल कर सामने आता है। जिन संस्थाओं से उम्मीद की जाती है कि अपराधों की निष्पक्ष जांच हो, लेकिन जब इस संस्थाओं में ब्राह्मणवादी सोच का ही बोलबाला हो तो न्याय मिलना लगभग असंभव सा ही हो जाता है। सितम्बर 2020 में हाथरस की गैंगरेप पीड़िता के मामले में पूरा सत्ता पक्ष बेनकाब हो जाता है। जिस तरह पुलिस ने पूरे मामले में ढिलाई बरती और मामले को रफा-दफा करने के लिए पीड़िता के शव को चुपके से आधी रात को जला दिया, यह सब करना सरकार के समर्थन और शह के बिना असम्भव है। लोगों के उठे रोष को दबाने के लिए पूरे गांव की बैरिकेटिंग करके पीड़ित परिवार को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। फ़र्ज़ी आरोपों पर पत्रकारों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। केरल के पत्रकार सिद्दकी कप्पन अभी भी बेगुनाह होकर भी जेल में कैद कर दिए गए है। कुलदीप सेंगर जिनको बलात्कार के अपराध में सजा सुनाई गई है उनको को जिस तरह से योगी सरकार ने संरक्षण दिया और पीड़िता के परिवार को खत्म करने की पूरी साज़िश रची गई हम सभी अनभिज्ञ नही है। जब स्वंय पुलिस अधिकारीगण का सामाजीकरण इस दलित-महिला विरोधी माहौल में हुआ हो तो वह भी दलित और महिला को नीच-जाहिल अछूत-अनपढ़ ही समझेंगे। और खासकर तब जब सिस्टम को बनाये रखना तो उनके दायित्वों में से एक हो। जब मशीन ही जातिवादी हो तो उसका फल तो यही होना निश्चित है। जाति व्यवस्था पूरे समाज का अमानवीकरण करती है। जब तक ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और पूरे समाज को दीमक की तरह चाटने वाली जाति व्यवस्था मौजूद रहेगी तब तक ऐसे अपराध होते रहेंगे।

2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर चाहे योगी सरकार अपने ऊपर लगे दागों को छुपाने के लिए जितनी भी मेहनत कर ले, सच्चाई को छुपाने की जितनी भी कोशिश कर ले अब जनता को तय करना है कि उत्तर प्रदेश का भविष्य क्या होना है।

लेखिका बीएचयू की छात्रा और भगतसिंह छात्र मोर्चा की अध्यक्ष हैं।

 दस्तक नए समय की अंक सितम्बर अक्टूबर २०२१ में प्रकाशित लेख

 

 


1 comment:

  1. योगीजी ने जो किया है वह उत्तर प्रदेश में पिछली सरकारों ने 10% भी उसका नही किया है। इनको योगी आदित्यनाथ के नाम से जाना जाता है बार बार अजय सिंह बिष्ट बोलकर क्या साबित करना चाहती है? जातिवादी से भरा लेख है ब्राह्मणवादी सोच को गलत बताकर ब्राह्मण विरोधी मानसिकता को दर्शा रहा है... राजस्थान का हालत देखिए जहा मुसलमान सरेआम दलितों की हत्या कर रहे है..! हाथरस में सबको राजनीतिक रोटियां सेंकनी थी इसीलिए वहा पत्रकारिता भी गला फाड़ कर हो रही थी..! कांड कही भी कोई भी हो किसी ने किसी को मारा या उसके साथ कुछ भी गलत किया है मेरे समझ आजतक नहीं आया इसमें "ब्राह्मण" शब्द को घसीट कर गरियाया क्यों जाता है? अलग ही स्तर का नशा है...

    ReplyDelete